भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

[Header] अ० २] भाषाटीकासमेता । ( १९१ )


पंचरात्रं वा सप्तरात्रमथापि वा ॥ १०८ ॥ लंघनञ्च समुद्दिष्टं ज्ञात्वा दोषबलाबलम्॥कफं विशोषितं ज्ञात्वा ततो वातनिवा- रणम्॥१०९॥ पित्तसंशमनं कार्यं ज्ञात्वा पित्तस्य कोपनम्॥ शोषणीयौ वातकफौ न तु पित्तं विनाशयेत् ॥ ११० ॥ प्राणोंके हरनेवाला और घोररूप ऐसे त्रिदोषजज्वरको देखकर प्रथम कफको शोषनेकी उपाय कहा है ॥ १०६ ॥ जो वैद्य अपने यशकी इच्छा चाहे तो त्रिदोषजज्वरमें पित्तको शांत नहीं करै, क्योंकि कफ और वातकी अधिकतावाले त्रिदोषजज्वररोगीको ज्वर मारदेता है ॥१०७॥ त्रिदोषजज्वरमें लंघन, वमन, ष्ठीवन ये हित हैं और इस रोगमें तीनरात्रि,पांचरात्रि, सातरात्रितक ॥ १०८ ॥ दोषके बल और अबलको जान लंघन करना चाहिये,जब कफके शोषको जानले तब वातको निवारण करे ॥ १०९ ॥ पित्तके कोपको जानकर पित्तकी भी शांति करनी और वात तथा कफको जरूर शोषे और पित्तको कभी भी नहीं नष्ट करे ॥ ११० ॥

अथ सन्निपात ज्वरका लक्षण और चिकित्सा । सत्तृष्णा शूलशोषः श्वसनमथ निशाजागरो वासरस्तु तन्द्रा मोहश्च शोषो भवति च वदने घ्राणजिह्वाधराणाम् ॥ पाकं निष्ठीवते यः कृशतनुश्च भवेन्मण्डलानाञ्च देहे सम्भूतिः श्या- वनेत्राधरवदनमदस्वेद आध्मानशोषः ॥ १११ ॥ क्षुन्नाशो वा भ्रमात्तिर्भवति शिरसो लोडनं वा शिरोऽर्त्तिः स्रोतोरोधो वमिर्वा गलकघुरघुराशूलकैर्वा वृतस्तु ॥ एतैर्लिङ्गैर्युतानां प्रभवति च नृणां सन्निपातेतिसंज्ञा रोगाणामाशुकारी ज्वर अतिदुखदो वाजिनां वा द्विपानाम् ॥ ११२ ॥ अच्छी तृषा, शूल, शोष, श्वास, रात्रिका जागना,दिनमें तंद्रा,मोह,मुखमें शोष ये उपजें और नासिका, जीभ, ओष्ठ इनका पाक होवे और वारंवार थूके और कृशशरीर होजावे और शरी- रमें मंडलोंकी उत्पत्ति हो और कालेनेत्र हो जावें होंठ काले हो जावें, मद और पसीना उपजे, अफारा और शोष भी हो ॥ १११ ॥ भूख जाती रहे, शिर भ्रमे अथवा शिरको हिलावे और शिरमें पीड़ा हो, स्रोत रुक जावे अथवा छर्दि हो और गलेमें घुर्धुरशब्द और शूल उपजे ये सब लक्षण होवें तब मनुष्यके सन्निपातज्वर जानना, यह रोगोंको शीघ्र करता है, घोड़ोंको तथा हाथियोंको भी अतिदुःख देता है ॥ ११२ ॥

अथ सन्निपातज्वरकी चिकित्सा । सन्निपातज्वरे पूर्वं कुर्य्याद्वातकफापहम् ॥ पश्चाच्छ्लेष्मणि संक्षीणे