भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 224

( १९२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- १निरामे पित्तमारुतौ ॥११३ ॥ सन्निपातज्वरे यत्नं कृत्वा तन्द्रां जयेत्पराम् ॥ उपद्रवः कष्टतमो ज्वराणां च विशेषतः ॥११४ ॥ पथ्यं कारयते यस्तु रोगिणं कफपूरितम् ॥ स एवास्य शत्रुः स्यान्न पथ्यं न च भेषजम् ॥ ११५ ॥ सन्निपातज्वरमें प्रथम वातकफको नाशनेवाली क्रियाको करे। जब कफका क्षय होजावे तब वात और पित्त आपही शांत होजाते हैं ॥ ११३ ॥ सन्निपातज्वरमें यत्नसे तंद्राको दूर करे यह सन्निपातमें अत्यन्त उपद्रव हैं और ज्वरोंके मध्यमें विशेष करके यह उपद्रव बुरा है ॥ ११४ ॥ सन्निपातज्वरमें जो वैद्य कफसे पूरितहुए रोगीको पथ्यदेवे वही वैद्य उसरोगीका वैरी जानना इसवास्ते पथ्यको और ऐसे वैसे औषधको भी नहीं देना ॥ ११५ ॥ अथ दशाङ्ग क्वाथ । शंटी द्विपञ्चमूलकं दुरालभा च कोटजम् ॥ पटोलं पौष्करं वाथ युक्ता भार्गवी पिप्पली ॥ ११६ ॥ निहन्ति सान्निपातिकज्वरा- ग्निमान्द्यं दशाङ्गः ॥ ११७ ॥ कचूर, दशमूल, जवासा, पिस्ते, परवल, पोहकरमूल, श्वेतदूब, पीपल, इन्होंका क्वाथ ॥ ११६॥ सन्निपातज्वर और मन्दाग्निका नाश करता है ॥ ११७ ॥ अथ भूनिम्बादि क्वाथ । भूनिम्बदारुदशमूलमहौषधाब्दतिक्तेन्द्रबीज धनिकाव्यकणाक- षायः ॥ तन्द्राप्रलापभ्रमतृड्रुचिदाहमोहश्वासाग्निमा- न्द्ययुतमाशुज्वरं निहन्ति ॥ ११८ ॥ चिरायता, देवदार, दशमूल, सोंठ, कुटकी, इन्द्रजव, धनियां, गोखरू, पीपल, इनका क्वाथ तंद्रा, प्रलाप, भ्रम, तृषा, अरुचि, दाह, मोह, श्वासहोग, मन्दाग्निज्वर इनको नाशताहै॥ ११८॥ अथ शुंठ्यादि क्वाथ । शुंठीघनागजकणासुरदारुधान्यातिक्ताकलिङ्गदशमूलसमोऽपि कल्कः ॥ श्रेष्ठस्त्रिदोषजनितज्वरनाशनाय श्वासभ्रमारुचिविब- न्धहृदामयघ्नः ॥ ११९ ॥ सोंठ, नागरमोथा, देवदारु, गजपीपल, धनियां, कुटकी, इंद्रयव, दशमूल, ये सब समान भाग ले कल्क बनावे यह त्रिदोषजज्वरको नाशता है और श्वासहोग, भ्रम, अरुचि, विबंध, हृद्रोग इनको नाशता है ॥ ११९ ॥ १ अत्र छन्दोभंग आर्षः ।