हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १९३ ) अथ मुस्तादि क्वाथ । मुस्तोशीरनिशाविशालमधुकं पाठा बला रोहिणी नीली धन्वयवासकङ्गरशटी शुण्ठी समङ्गा त्रिवृत् ॥ यष्टीपिप्पलिमू- लपर्पटफला पिप्पल्यकं दारु च श्यामाहेमगुडूचिकासमपयः क्वाथो ज्वरान्तः स्मृतः ॥ १२० ॥ नागरमोथा, खस, हलदी, सुन्दर मुलहटी, स्योनापाठा, खरैंटी, हरड़ै, नील जवासा, टेंभूर्नी, कचूर, सोंठ, मजीठ, निशोत अथवा मुलहटी, पीपलामूल, पित्तपापड़ा, पीपल, देवदार, काली निशोत, कचनार, गिलोय इनका समान पानीमें क्वाथ बनावे यह ज्वरको नाशता है॥१२०॥ अथ बृहत्यादि क्वाथ । द्वे बृहत्यौ शठी शृङ्गी किरातं कटुरोहिणी ॥ पटोलं पौष्करं भाङ्गीं वत्सकञ्च दुरालभा ॥ १२१ ॥ एतद्वृहत्यादिकपाचनं स्यात्कासादिकोपद्रवनाशनञ्च ॥ शीघ्रं निहन्ति ज्वरसन्निपातं शूलार्तितन्द्राशमने प्रशस्तम् ॥ १२२ ॥ दोनों कटेहली, कचूर, काकड़ासिंगी, चिरायता, कुटकी, परवल, पोहकरमूल, भारंगी, इन्द्रयव, जवासा इन्होंका क्वाथ बनावे ॥१२१॥ यह कटेहलीआदि पाचन है, खांसी आदि उपद्रवको और सन्निपातज्वरको शीघ्र नाशता है, शूल और तंद्राको शांत करनेमें अतिश्रेष्ठ है ॥ १२२ ॥ अथ शटचादि पाचन । शटी किरातं कटुका विशाला गुडूचिभृङ्गी बृहतीद्वयं च॥ महौ- षधं पौष्करधन्वयासरास्नासुराह्वा गजपिप्पली च ॥१२३॥ पीतं तु निष्क्वाथ्य हितं नराणां शट्यादिचातुर्दशकं प्रशस्तम्॥ जघान तन्द्राश्वसनं शिरोऽर्त्तिजाड्यं सशूलं ज्वरमाशु हन्ति १२४ कचूर, चिरायता, कुटकी, इंद्रायण, गिलोय, अतीस,: दोनों कटेली, सोंठ, पोहकरमूल, जवासा, रायसन, देवदारु, गजपीपल ॥ १२३ ॥ इनका क्वाथ बना पीवे, यह चौदह औष- धोंका क्वाथ हितकर है और तंद्रा, श्वास, शिरका रोग, जड़पना, शूल, ज्वर इनको शीघ्र नाशता है ॥ १२४ ॥ अथ भूनिम्बादि क्वाथ । भूनिम्बसुरदारुनागरघनातिक्ताकलिङ्गानि च तद्वद्धस्तिकणा १३