हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १९३ ) अथ मुस्तादि क्वाथ । मुस्तोशीरनिशाविशालमधुकं पाठा बला रोहिणी नीली धन्वयवासकङ्गरशटी शुण्ठी समङ्गा त्रिवृत् ॥ यष्टीपिप्पलिमू- लपर्पटफला पिप्पल्यकं दारु च श्यामाहेमगुडूचिकासमपयः क्वाथो ज्वरान्तः स्मृतः ॥ १२० ॥ नागरमोथा, खस, हलदी, सुन्दर मुलहटी, स्योनापाठा, खरैंटी, हरड़ै, नील जवासा, टेंभूर्नी, कचूर, सोंठ, मजीठ, निशोत अथवा मुलहटी, पीपलामूल, पित्तपापड़ा, पीपल, देवदार, काली निशोत, कचनार, गिलोय इनका समान पानीमें क्वाथ बनावे यह ज्वरको नाशता है॥१२०॥ अथ बृहत्यादि क्वाथ । द्वे बृहत्यौ शठी शृङ्गी किरातं कटुरोहिणी ॥ पटोलं पौष्करं भाङ्गीं वत्सकञ्च दुरालभा ॥ १२१ ॥ एतद्वृहत्यादिकपाचनं स्यात्कासादिकोपद्रवनाशनञ्च ॥ शीघ्रं निहन्ति ज्वरसन्निपातं शूलार्तितन्द्राशमने प्रशस्तम् ॥ १२२ ॥ दोनों कटेहली, कचूर, काकड़ासिंगी, चिरायता, कुटकी, परवल, पोहकरमूल, भारंगी, इन्द्रयव, जवासा इन्होंका क्वाथ बनावे ॥१२१॥ यह कटेहलीआदि पाचन है, खांसी आदि उपद्रवको और सन्निपातज्वरको शीघ्र नाशता है, शूल और तंद्राको शांत करनेमें अतिश्रेष्ठ है ॥ १२२ ॥ अथ शटचादि पाचन । शटी किरातं कटुका विशाला गुडूचिभृङ्गी बृहतीद्वयं च॥ महौ- षधं पौष्करधन्वयासरास्नासुराह्वा गजपिप्पली च ॥१२३॥ पीतं तु निष्क्वाथ्य हितं नराणां शट्यादिचातुर्दशकं प्रशस्तम्॥ जघान तन्द्राश्वसनं शिरोऽर्त्तिजाड्यं सशूलं ज्वरमाशु हन्ति १२४ कचूर, चिरायता, कुटकी, इंद्रायण, गिलोय, अतीस,: दोनों कटेली, सोंठ, पोहकरमूल, जवासा, रायसन, देवदारु, गजपीपल ॥ १२३ ॥ इनका क्वाथ बना पीवे, यह चौदह औष- धोंका क्वाथ हितकर है और तंद्रा, श्वास, शिरका रोग, जड़पना, शूल, ज्वर इनको शीघ्र नाशता है ॥ १२४ ॥ अथ भूनिम्बादि क्वाथ । भूनिम्बसुरदारुनागरघनातिक्ताकलिङ्गानि च तद्वद्धस्तिकणा १३
( १९४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने द्विपञ्चकगणैर्युक्तः क्वाथो हितः ॥ पीतः सर्वरुजां विनाशन- करः स्यात्सन्निपातज्वरं हन्ति श्वासविशोषवक्षसिरुजं तन्द्रां जघान द्रुतम् ॥१२५ ॥ चिरायता, देवदारु, सोंठ, नागरमोथा, कुटकी, इन्द्रयव, गजपीपल, दशमूल इन सात चीजोंके क्वाथ बना पीना । यह सब प्रकारके रोगोंको और सन्निपातज्वरको नाशता है और श्वासरोग, शोषरोग, छातीकी पीड़ा, तंद्रा इनको शीघ्र नाशता है ॥ १२५ ॥ अथ बृहद्रास्नादि क्वाथ । रास्त्रा गुडूचीघनपर्पटकं पटोली भूनिम्बवत्सकशटीयुतनागराणा- म् ॥ तिक्तासुराह्वगजमागधिकायवासावासाबलागजबलाक्वथितः समांशः॥ १२६॥ क्वाथो निहन्ति मरुतप्रभवामयानां सश्वास- कासजठरार्तिविषूचिकानाम्॥ श्रेष्ठो नृणां भुवि च पाचनसन्नि- पाते रोगेऽथवा कफसमीरणके प्रदेयः ॥ १२७ ॥ रायसन, गिलोय, नागरमोथा, पित्तपापड़ा, परंवल, चिरायता, इन्द्रयव, कचूर, सोंठ, कुटकी, देवदारु, गजपीपल, जवासा, वांसा, खरैहटी, बड़ी खरैहटी ये सब समानभाग ले क्वाथ बनावे ॥ १२६ ॥ यह क्वाथ वातसे उपजे रोग, श्वासरोग, खांसी, पेटरोग, विषूचिका, इनको नाशता है। यह पाचन मनुष्योंको संसारमें श्रेष्ठ है अथवा कफवातके रोगमें देना चाहिये ॥ १२७ ॥ अथ लघुरास्नादि । रास्त्रात्रिकण्टकघनाशतमोषधीनां भार्ङ्गी सपुष्करयुता सुर- दारुधान्याः ॥ क्वाथो हितः सकलमारुतजिज्ज्वरेषु स्यात्स- न्निपातप्रभवेष्वतिदारुणेषु ॥ १२८ ॥ रायसन, गोखरू, नागरमोथा, शतावरी, भारंगी, पोहकरमूल, देवदारु, धनियां इनका क्वाथ दारुण सन्निपातज्वरोंमें हित है और वायुसे उत्पन्न रोगोंको जीतता है ॥ १२८ ॥ अथ त्रिवृतादि मलभेदन । त्रिवृद्विशाला च तथा सुराह्वमारग्वधस्तिक्तकरोहिणी च ॥ क्वाथोभवेद्भेदनको मलानां स्याद्वातशूले नयतो भयघ्नः॥१२९॥ निसोध, इन्द्रायणकी जड़, देवदारु, अमलतास, कुटकी इनका क्वाथ मलको पतला करता है और वातशूलको करता है ॥ १२९ ॥
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १९५ ) अथ सन्निपातस्वेदहर । वचा यवानी च महौषधञ्च शुष्कञ्च चूर्णं तनुलेपनाय ॥ शस्तं वदन्ति ज्वरघर्मशान्तिं करोति नूनं परिमर्द्दनञ्च ॥ १३० ॥ मागधी च सुरदारु तथा च विश्वकं तिक्ता च दीप्यकयुतं तनुलेपनाय ॥ चूर्णं प्रशस्तमपि वारयते शरीरे स्वेदञ्च शीतलतनुर्भवेदाशु नूनम् ॥ १३१ ॥ वच, अजमान, सोंठ इनका सूखा चूर्ण बना शरीरपै मालिस करे । यह ज्वरको और पसी- नाको शांत करता है ॥ १३० ॥ पीपल, देवदारु, सोंठ, कुटकी, अजमान इनका चूर्ण बना शरीरपै मालिस करनेसे पसीने दूर होते हैं और शरीर शीतल होजाता है ॥ १३१ ॥ अथ नस्यविधान । मधूकसारं समहौषधेन वचोषणा सैन्धवसंयुता च ॥ मूत्रेण वा चोष्णजलेन पिष्टं प्रनष्टज्ञानप्रतिबोधनाय ॥ १३२ ॥ शोभाञ्जनमूलस्य रसं समरिचान्वितम्॥विसंगितानां नस्यं स्याद्बोधनं चाशु रोगिणाम् ॥१३३ ॥ महुआका सार, सोंठ, बच, मिर्च, सैंधानमक इनको गोमूत्रमें अथवा गरमपानीमें पीस नाकमें चढावे, यह नस्य मूर्च्छाको प्राप्तहुएको जगाता है ॥ १३२ ॥ सहिंजनाकी जड़के रसमें मिरचोंका चूर्ण मिला नासिका में चढ़ानेसे संज्ञासे रहित मनुष्योंको शीघ्र ज्ञान होजाता है ॥ १३३ ॥ अथ प्रधमनविधि । एकं बृहत्याः फलपिप्पलीकं शुण्ठीयुतं चूर्णमिदं प्रशस्तम् ॥ प्रधामयेद्घ्राणपुटे तु संज्ञाचेष्टां करोति क्षवथुप्रबोधः॥ १३४॥ बडी कटेलीका एक फल, पीपल, सोंठ इनका चूर्ण बना पुटलीके द्वारा नासिका में चढानेसे छींक आती है और चेष्टा होजाती है ॥ १३४ ॥ अथ अंजनविधि । शिरीषबीजं मरिचोपकुल्यामूत्रेण घृष्टं सह सैन्धवेन ॥नेत्राञ्जनं स्यान्नयने नराणां प्रनष्टसंज्ञां प्रकरोति बोधः ॥ १३५ ॥ त्रिकटु तथा च करञ्जबीजं त्रिफला सुरदारु सैन्धवम्॥ तुलसी वर्तिर्नयनाञ्जनकं तन्द्रानाशं करोति नयनानाम् ॥ १३६ ॥
( १९६ ) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने- शिरसके बीज, मिर्च, पीपल, सेंधानमक इनको गोमूत्रमें पीस नेत्रोंमें आंजे । यह अंजन नष्टहुई संज्ञाको फिर उपजाता है ॥ १३५ ॥ सोंठ, मिर्च, पीपल, करंजुवाके बीज, हरडैं, बहेड़ा, आँवला, देवदार, सेंधानमक, तुलसी, इनको पीस बत्ती बना नेत्रोंमें आंजे । यह आंजन तंद्राको नाशता है ॥ १३६ ॥ अथ निष्ठीवनविधि । केसरं मातुलुङ्गस्य शृङ्गवेरं ससैन्धवम् ॥ त्रिकटुसंयुक्तं कृत्वा आकण्ठाद्धारयेन्मुखे ॥ १३७ ॥ दन्तजिह्वामुखं तालुघर्षणं कारयेद्बुधः॥ कुर्य्यान्निष्ठीवनं सर्वं वारंवारं विधानतः॥१३८॥ तेन कण्ठविशुद्धिः स्याच्छ्लेष्माणं चापकर्षति॥जिह्वापटुत्वरु- चिक्कृत्कासः श्वासश्च शाम्यति ॥१३९॥ त्रिकटुचव्यकापथ्या- चूर्णं सैन्धवसंयुक्तम् । तेन दन्तांस्तथा जिह्वां घर्षयेत्तालुकाम- लम् ॥ १४० ॥ निष्ठीवनं गलशुद्धिरुचिकृत्कफसूदनम् ॥ हल्ल्लासो नाशमाप्नोति पटुत्वं कुरुते भृशम् ॥ १४१ ॥ बिजौराकी केसर, अदरख, सेंधानमक, सोंठ, मिरच, पीपल इनको मिला मुखमें धारे ॥ १३७ ॥ पीछे दंत, जीभ, मुख, तालु इन्होंको घिसे पीछे विधानसे बारंबार थूकता जावे ॥ १३८ ॥ इससे कंठकी शुद्धि होती है और कफ दूर होजाता है और जीभ साफ होजाती है और रुचि उपजती है, खांसी और श्वास शांत होजाता है ॥ १३९ ॥ सोंठ, मिरच, पीपल, चव्य, हरडै, सेंधानमक इन्होंके चूर्णसे दंत, जीभ, तालु, इन्होंको घिसे ॥ १४० ॥ यह निष्ठीवनकर्म गलकी शुद्धि और रुचिको करता है, कफको दूर करता है, थुकथुकीको नाशता है और अत्यन्त स्वादको उपजाता है ॥ १४१ ॥ अथ सन्निपातमें विशेषता । यदि वा शीतगात्रे च तदा स्वेदो विधीयते ॥ स्वेदास्त्रयोदश ज्ञेयाः स्वेदवारणकारणाः ॥ १४२ ॥ सङ्करःप्रस्तुतो नाडीप- रिषेकोऽपगाहनः ॥ आतङ्कोऽस्मयनः कर्षः कूटी भूकुम्भिरेव च ॥१४३॥कूपो होलाक इत्येते स्वेदयन्ति त्रयोदश ॥१४४॥ कालस्वेदं घटीस्वेदं वालुकास्वेदमेव च॥ कारयेद्धस्तपादाभ्यां १ स्विद्यतेऽनेनेति स्वेदोऽग्निस्तस्य वारणे कारणाः ।
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १९७ ) तथा शिरसि चातुरे॥ एवं नो शान्तिर्यदि वा दहेल्लोहशलाक- या ॥१४५॥ पादौ दग्धे न चेच्छैत्यं दहेद्वाऽङ्गुष्ठमूलके ॥ तथा च मणिबन्धे च हृदि मूर्ध्नि तथापि वा ॥१४६॥ स्वेदो ललाटे सुहिमो नरस्य शीतार्दितस्यापि सपिच्छलस्य ॥ कण्ठस्थितो यस्य न याति वक्षो नूनं समभ्येति गृहं हि मृत्योः ॥१४७॥ सप्ताहे वा दशाहे वा द्वादशाहेऽथवा पुनः ॥ त्रयोदशे पञ्चदशे प्रशमं याति हन्ति वा ॥ १४८ ॥ अथ पञ्चादशाहे वा हन्ति रक्षति मानवम् ॥ सन्निपातो महाघोरो ज्वरः कालाग्निसन्निभः ॥१४९॥ एषा त्रिदोषमर्यादा मोक्षाय च वधाय च॥सन्नि- पातस्य दोषस्य नरस्यास्य भिषग्वर॥ १५०॥सन्निपातेऽन्तर्दाहे मनुजं यः शीतवारिणा सिञ्चेत्॥ आतुरः कथमपि जीवेद्वैद्य- श्चासौ कथं पूज्यः॥१५१॥यःसन्निपातजलधौ पतितं मनुष्यं वैद्यः समुद्धरति किन्न कृतं नु तेन ॥ धर्मेण वाथ यशसा विनयेनयुक्तः पूजां च कां भुवितले न लभेत वैद्यः ॥१५२॥ जो शीतल शरीर हो तब पसीना देना चाहिये, अग्नि दूर करनेके कारणरूपी स्वेद अर्थात् पसीने तेरह जानने ॥ १४२ ॥ संकर, नाड़ीपारिषेक, अवगाहन, आर्तक, अस्मयन, कर्ष, कूटी, भूकुंभि ॥ १४३ ॥ कूप होलाका, कालस्वेद, घटीस्वेद, वालुकास्वेद ये तरह प्रकारके स्वेद मनुष्यके पसीनाको लाते हैं ॥ १४४ ॥ इनसे रोगीके हाथ, पैर, शिर इन्होंपै पसीनाको देवे । जो ऐसे शांति नहीं हो तब लोहाकी सलाईसे दाग देवे ॥ १४५ ॥ जो पैरपै दाग दियेसे भी शीतलता नहीं उपजे तब अँगूठाके मूलमें दग्ध करे अथवा मणिबन्ध अर्थात् पहुँचा, हृदय, मस्तक, इन्होंमें दग्ध करे ॥ १४६ ॥ जिसके मस्तकपै ठण्डा पसीना आवे और सब शरीर शीतल होवे, शीतसे पीड़ित और कफकी अधिकतावाला ऐसे मनुष्यके कण्ठ- तक पसीना आवे, छातीमें नहीं प्राप्त होवे वह मनुष्य निश्चय मृत्युको प्राप्त होता है ॥ १४७॥ सातमा अथवा दशमां अथवा बारमां,तेरमां पन्दरमां इन दिनोंमें सन्निपात ज्वर शांत हो जाता है अथवा रोगीको मार देता है॥ १४८ ॥ और पन्द्रहवें दिन निश्चय सन्निपातज्वर शांत होता है अथवा रोगीको मारता है । यह सन्निपातज्वर महाघोररूप है, काल और अग्निके समान कांतिवाला हैं ॥ १४९ ॥ सन्निपातकी शांत होनेकी अथवा मारनेकी यह मर्यादा है ॥ १५० ॥ सन्निपातमें जो शरीरमें दाह उपजे तब वैद्य शीतलपानीके छिड़के दिवाता है तब रोगी नहीं
( १९८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- जीवता और वह वैद्य पूजाको प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १५१ ॥ सन्निपातरूपी समुद्रमें पड़े हुए रोगी मनुष्यको जो वैद्य उद्धार करता है उस मनुष्यने क्या नहीं किया और धर्म, यश, तथा विनय करके युक्त वह वैद्य इस भूतलमें कौनसी पूजाको नहीं पाता है ? अर्थात् सर्वत्र य होता है ॥ १५२ ॥ अथ कर्णमूल ( शोज़ा ) का निदान और चिकित्सा । वातपित्तकफैस्त्रिभिर्युक्तस्तथा त्रिदोषजः॥ स च रक्तेन संयुक्तो ज्वरः स्यात्सान्निपातिकः ॥१५३॥ न रक्तेन विना विद्धि ज्वरं वै सान्निपातिकम्॥क्वाथैः पाचनकैर्दोषः प्रशमं यान्ति मानवे ॥ १५४ ॥ तस्मात्प्रशमिते दोषे रक्तं नैव विलीयते ॥ तेनैव जायते शोफः कर्णमूले तु दारुणः ॥१५५॥ तस्मात्तस्य प्रती- कारं कुर्य्याद्रक्तविरेचनम् ॥ जलौकालावुशृङ्गैस्तु ततश्च लेपनं हितम् ॥ १५६ ॥ वातं, पित्त, कफ इन तीनोंसे युक्त त्रिदोषज्वर होता है और रक्तसे संयुक्त हुआ यही ज्वर सन्निपात कहाता है ॥ १५३ ॥ रक्तके विना सन्निपात ज्वरको नहीं जानना । क्वाथ और पाचनसंज्ञक क्वाथोंसे मनुष्यके तीनों दोष शान्त हो जाते हैं ॥ १५४ ॥ इस कारणसे दोष शान्त भी हो जाते हैं परन्तु रक्त नहीं शान्त होता उसकरके कानके जड़में भयंकर शोजा उप- जता है ॥ १५५ ॥ इससे उसकी चिकित्सा रक्तका निकालना है जोंक, तुंबी, शींगी, इनसे रक्तको निकासे पीछे लेप कराना ॥ १५६ ॥ अथ कर्णशोथके ऊपर लेप । बीजपूरकमूलानि अग्निमन्थस्तथैव च ॥ आलेपनमिदं चास्य कर्णमूलस्य नाशनम् ॥ १५७ ॥ बिजौराकी जड़, अरनी इनको पानीमें पीस लेप करना, यह लेप कर्णमूलको नाशता है ॥ अथ दूसरा लेप । आगारधूपरजनीसुमहौषधेन सिद्धार्थसैन्धववचापयसा विमर्द्य॥ लेपोहितो२रक्तविनाशकारी शोफव्रणस्य शमनो मनुजस्य कर्णे ॥ घरका धुआं ( श्रीवेष्टधूप ) हल्दी, सोंठ, सरसों, सेंधानमक, वच, इनको दूधसे १ "सन्निपातज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदारुणः। शोथःसञ्जायते तेन कश्चिदेव प्रमुच्यते" । इति माधवः । २ आस्मिँश्चरणे छन्दोभंगः ।
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । (१९९) पीस कर्णमूलपर लेप करना । यह लेप रक्तके विकारको नाशता है, शोजा और वावको शान्त करता है ॥ १६८ ॥ अथ व्रणरोपण औषध । यदा पाको भवेत्तस्य कार्या तत्र प्रतिक्रिया॥ धवार्जुनकदम्ब- त्वग्लेपनं व्रणरोहणम्॥ १६९॥ निम्बारग्वधमूलानां निशायुक्तं प्रलेपनम्॥स्रावणं पूयगन्धानां रोहणं स्याद्व्रणेषु च ॥ १६०॥ जो कानकी जड़में शोजा पक जावे वहां जो क्रिया करनी चाहिये वहकही जाती है, धवकी छाल, अर्जुनवृक्षकी छाल, कदंबकी छाल इनको पीस लेप करनेसे घावपै अंकुर आ जाता है ॥ १६९ ॥ नींवकी छाल, अमलतासकी छाल, हल्दी इनका लेप राध और दुर्गंधको हटाता है और घावोंपर अंकुरको लाता है ॥ १६० ॥ अथ कर्णशोथवालेको पथ्य । वर्जयेच्च दिवास्वप्नं योषित्सङ्गं बहुदकम्॥ शीतांबु जागृतिं रात्रौ व्यायामं शोचनं तथा॥ १६१॥ माषांश्च यवगोधूमतिलपर्णीकमेव च ॥ मसूरत्रिपुटांश्चैतांस्तैलञ्च दूरतस्त्यजेत् ॥ १६२॥ मास- मेकं व्यवायं च पक्षैकं चातिभोजनम्॥ वर्जयेत्कर्णमूलञ्च सुखं तेनोपपद्यते ॥ १६३॥ षष्टिकात्रं पुराणं वा बाल्यं सूपस्तथा- ढकी ॥ कुलत्थमुद्गयूषं वा भोजने च प्रशस्यते ॥ १६४ ॥ वार्त्ताकञ्च पलाण्डु च कन्दशाकान्परित्यजेत् ॥ एतेन सुखमा- प्नोति शीघ्रं रोगाद्विमुच्यते ॥ १६५ ॥ इस कर्णमूलमें दिनका सोना, स्त्रीसंग, पानीका बहुत पीना, शीतल पानी, रात्रिका जागना, कसरत, सोच ॥ १६१ ॥ उड़द, यव, गेहूं, तिलका पदार्थ, मसूर, त्रिपुँटा, तेल इनको दूरसे बर्जे ॥ १६२ ॥ और एक महीनातक मैथुनको और पंद्रह दिनोंतक अत्यन्त भोजनको वर्जेतब सुख होता है ॥ १६३ ॥ साठीचावल, पुरानाअन्न, अरहरकी दाल, कुलथी और मूंगौंकायूष ये सब भोजनमें श्रेष्ठ हैं ॥ १६४ ॥ वार्त्ताकु (बैंगन), प्याज, कंदशाक इनको त्यागे ऐसे कर- नेसे सुखको प्राप्त होता है और शीघ्र रोगसे छूटता है ॥ १६५ ॥ १ मल्लिका, सूक्ष्मैला, त्रिवृत, कर्णस्फोटा, स्थूलैला, कलायू, चमेली, छोटी इलायची, निशोथ, तिरबी कनफोडी, बडी इलायची, खेसारी, मटर । आयुर्वेदशब्दार्णव ।
( २०० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ अंतर्दाहका कारण । अन्ते पित्तं यदा तिष्ठेद्वाह्ये श्लेष्मसमीरणौ ॥ तदान्तर्दाहशोषः स्याद्वाह्ये सस्वेदशीतता ॥ १६६ ॥ जब शरीरके भीतर पित्त स्थित होजाता है और शरीरके बाहर कफ और वात स्थित होता है तब शरीरके भीतर दाह और शोष उपजता है और शरीरके बाहर पसीना और शीत- लता होती है ॥ १६६ ॥ अथ अंतर्दाहकी चिकित्सा । तस्यामृता पयः क्वाथं मधुपिप्पलिसंयुतम्॥ पाययेदाशु मुच्येत ज्वराद्वै सान्निपातिकात् ॥ १६७॥ अथवातिविषा वालं नागरं घनपर्पटम्॥ क्वाथो वा शर्करायुक्तश्चान्तर्दाहोपशान्तये॥१६८॥ उसको गिलोयके काथमें शहद और पीपलका चूर्ण मिला पान करावे तब शीघ्र ही सन्निपात ज्वरसे छुट जाता है ॥ १६७ ॥ अथवा अतीस, नेत्रवाला, सूंठ, नागरमोथा, पित्तपा- पडा इनका काथ बना उसमें खांड मिला पीवे तब शरीरके भीतरकी दाह शांत होती है ॥ १६८ ॥ अथ बाह्यदाहका कारण और चिकित्सा । बाह्ये पित्तं यदा तिष्ठेदन्ते वा कफमारुतौ ॥ तेनोष्णत्वं शरी- रस्य अन्ते शैत्यं च जायते॥१६९॥ तस्य शट्यादिकं क्वाथं प्रयुञ्जीयात्कफापहम् ॥ १७० ॥ जब शरीरके बाहिर पित्त स्थित हो और शरीरके भीतर कफ और वात स्थित होवे तब शरीर गरम होता है, हाथ और पैरोंमें शीतलता होती है॥१६९॥ तिसको कचूरंआदि पूर्वोक्त क्वाथका पान कराना, यह कफको शांत करता है ॥ १७० ॥ अथ शरीर शीतल और अर्ध गर्म होनेका कारण और चिकित्सा । यस्योर्ध्वाङ्गे वातकफावधोगं पित्तमेव च ॥ तेनार्द्धं शीतलं गात्रमर्द्धं चोष्णं च जायते ॥ १७१ ॥ तस्य रास्नादिकं क्वाथं प्रयुञ्जीयात्तथोष्णकम् ॥ १७२ ॥ यस्योर्ध्वं रक्तपित्तञ्च मध्ये वातकफावुभौ॥तेनोर्ध्वं जायते चोष्णमधः शीतं प्रजायते ॥१७३॥ तस्य नागरादिक्वाथंयुञ्जीयाद्भिषगुत्तमः ॥१७४ ॥ १ कचूर, चिरायता, कुटकी, इन्द्रायण, गिलोय, अतीस, दोनो कटेली, सौंठ, पुष्करमूल, जवासा, रायसन, देवदारु, गजपीपल ।
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( २०१ ) जिसके ऊपरके अंगोंमें वात और कफकी स्थिति हो और नीचेके अंगमें पित्तकी स्थितिहो तिसकरके आधा शरीर गरम रहता है और आधा शरीर शीतल रहता है ॥ १७१ ॥ तिसको पूर्वोक्त गर्मगर्म रास्नादि काथका पान कराना ॥ १७२ ॥ जिसके ऊपरले अंगोंमें रक्त और पित्तहो और मध्यमें वात और कफ हो तिससे ऊपरका शरीर गर्म रहता है और नीचेका शरीर शीतल रहता है ॥ १७३ ॥ उसको पूर्वोक्त शुंठ्यादि काथका पान कराना ॥ १७४ ॥ यस्योष्मा दृश्यत चापि मन्दस्रष्टा च जायते॥ बाह्यवेगं विजा- नीयाज्ज्वरः साध्यो विजानता ॥ १७५ ॥ यस्यान्ते जायते चोष्मा तृष्णा दाहः शिरोव्यथा॥ गम्भीरवेगं जानीयात्कृच्छ्र- साध्यो नृणामपि ॥ १७६ ॥ तस्य कुर्यात्प्रतीकारं योगो- ऽष्टादशको नृणाम् ॥ १७७ ॥ जिसके गरमाई हो और ज्वरका मन्दवेग हो उसको बाह्यवेगज्वर कहते हैं । यह ज्वर साध्य होता है ॥ १७५ ॥ जिसके हाथ और पैरमें गरमाई हो और तृषा, दाह, शिरमें पीड़ा ये उपजें तिसको गंभीरवेगज्वर कहते हैं यह मनुष्योंके कष्टसाध्य होता है ॥ १७६॥ उसके लिये अष्टा- दशांग क्वाथ काफी है ॥ १७७ ॥ अथ शीतल अंगमें गरम करनेकी चिकित्सा । अन्ते पित्तं यदा तिष्ठेद्देहे वातकफावुभौ ॥ तेन शैत्यं शरीरस्य उष्णत्वं करपादयोः ॥ १७८ ॥ तस्य रास्नादिकः क्वाथः प्रदेयः पिप्पलीयुतः ॥ १७९ ॥ जब हाथ और पैरमें पित्तकी स्थिति हो, शरीरमें वात और कफकी स्थिति हो उस करके शरीर शीतल रहता है, हाथ और पैरोंमें गर्माई जाननी ॥ १७८ ॥ उसको रास्नादि काथमें पीपलका चूर्ण मिला पान कराना ॥ १७९ ॥ अथ गर्मीका उपचार । देहे पित्तं यदा तिष्ठदंते वातकफावुभौ ॥ तस्योष्मा जायते देहे शीतत्वं करपादयोः ॥ १८० ॥ तस्य द्राक्षादिकः क्वाथः प्रदेयो गुडकान्वितः ॥ १८१ ॥ जिसके देहमें पित्त स्थितहो, हाथ और पैरोंमें वायु कफ स्थित होवे तिसका देह गर्म रहता है हाथ और पैर शीतल रहते हैं ॥ १८० ॥ उसको द्राक्षादिक्वाथमें गुड़मिला पान कराना १८१ १ हा. सं. १९४ पृ० ।
( २०२ ) हारितसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ शीतत्वका उपचार । यत्र यत्र भवेच्छैत्यं तत्र स्वेदो विधीयते ॥ नात्युष्णे स्वेदनं कार्यं ज्वरस्यास्य विजानता ॥ १८२ ॥ और जहां जहां शीतलता होवे वहां २ पसीना देना चाहिये। इस सन्निपात ज्वरको जाननेवाले वैद्यको अत्यन्त गर्माईमें पसीना नहीं देना चाहिये ॥ १८२ ॥ ज्वरादिकोंका कारण वायु है। कफपित्तेन निश्चेष्टो भवत्येवानिलः सदा ॥ तस्मादेवानिलाद्रोगाः सम्भवन्ति ज्वरादयः ॥ १८३ ॥ कफ और पित्तसे चेष्टा करके रहित हुआ वात सब कालमें रहता है उस कारण करके वात- से ही ज्वरआदि सब रोग उपजते हैं ॥ १८३ ॥ अथ ज्वरमुक्तिका लक्षण । भ्रमः शैत्यं विह्वलता कम्पो विड्भेदनं क्लमः ॥ श्रमः स्वेदो जल्पनञ्च ज्वरमोक्षे भवन्ति च ॥ १८४ ॥ भ्रम, शीतलता, विह्वलपना, कंप, विष्ठाका पतलापन, थकानसी, परिश्रम, पसीना, बोलना ये सब ज्वरके दूर होनेके समय होते हैं ॥ १८४ ॥ अथ ज्वर उतरनेका लक्षण । प्रस्वेदकण्डू च शिरा च पुष्टा तथा मुखेषु क्षवथुर्लघुत्वम् ॥ अन्नाभिलाषो विपुलेन्द्रियश्च गतक्लमो गतरुजो मनुष्यः ॥ १८५ ॥ पसीना आवे, खाज चले और नाड़ी पुष्ट हो जावे और मुखमें छींक आवे और शरीरका हलकापन हो और अन्नकी इच्छा हो और इन्द्रियें प्रसन्न हो जावें, ग्लानि और पीड़ा जाती रहे तब जानो ज्वर उतरा ॥ १८५ ॥ अथ ज्वर नहीं उतरनेका और लौटानेका लक्षण । विमुक्तस्यापि हि शिरोगुरुत्वं नव मुञ्चति ॥ अविमुक्तं विजानीयाज्ज्वरः पुनरुपैति तम् ॥ १८६ ॥ ज्वरसे मुक्त हुआ मनुष्य शिरके भारीपनको नहीं छोड़े तब जानो कि अभी ज्वर नहीं छूटा और उस मनुष्यको फिर ज्वर उपजेगा ऐसा जान ले ॥ १८६ ॥ अथ विषमज्वरका लक्षण और चिकित्सा । यदि धातुगतश्चैव ज्वरो देहे प्रपद्यते॥विषमज्वरं विजानीयात्स
अ० २ ] भाषाटीकासमेत। ( २०३ )
च ज्ञेयश्चतुर्विधः ॥ १८७ ॥ एकाहिको व्याहिकश्च त्र्याहिकश्च तथापरः ॥ वेलाज्वरश्चतुर्थोऽपि विजानीयाद्विचक्षणः ॥१८८॥ जो देहके धातुओंमें ज्वर प्राप्त हो उसको विषमज्वर जानना वह चार प्रकारका है ॥१८७॥ एकाहिक अर्थात् दिनमें एक वार आनेवाला, द्वयाहिक अर्थात् दूसरे दिन आनेवाला त्र्याहिक अर्थात् तीसरे दिन आनेवाला और समयपै चौथे दिन आनेवाला चातुर्थिक वैद्योंको जानना चाहिये ॥ १८८ ॥ अथ एकाहिकज्वरका लक्षण। शीतश्च पूर्वं भवति पश्चादुष्णश्च जायते ॥ स साध्यो मनुजे प्रोक्तः शीघ्रं सिध्यति भेषजः ॥ १८९ ॥ पश्चाच्च दाहमाप्नोति ज्वरो भवति दारुणः ॥ सोऽपि न मुच्यते शीघ्रं ज्वरो धातु- क्षयङ्करः ॥ १९०॥ जिसमें प्रथम शीत उपजे और पीछे गरमाई उपजे वह साध्यज्वर जानना । यह औषधोंसे शीघ्र जाता रहता है ॥ १८९ ॥ भयंकर ज्वर होके पीछे दाहसे संयुक्त हो वह शीघ्र नहीं जाता है । यह ज्वर धातुओंका क्षय करता है ॥ १९० ॥ अथ तृतीय ज्वर लक्षण । त्रिकोरुकट्यां रुजवातपित्तं स्याच्च पित्तं मस्तके रुग्भ्रमश्च ॥ पृष्ठे तनुश्लेष्मरुजाकरं स्यान्त्रिधा तृतीयज्वरलक्षणं तत्॥१९१॥ कफपित्तात्त्रिकग्राही पृष्ठाद्वातकफात्मकः ॥ वातपित्ताशिरोग्राही त्रिविधः स्यात्तृतीयकः ॥ १९२ ॥ कटिप्रांत, जांघ, कटि इन्होंनेसे वात और पित्तसे पीडा हो और मस्तकमें पित्तसे पीडा हो और भ्रम उपजे और पृष्ठभागमें सूक्ष्म कफ पीडाको करता हो ऐसे तृतीय ज्वरका लक्षण तीन प्रकारका है ॥ १९१ ॥ वात और कफसे उपजा तृतीयकज्वर प्रथम कटिप्रांतमें पीडाको उपजा पीछे आप उपजता है, वात और कफसे उपजा तृतीयकज्वर प्रथम पृष्ठ नितंब स्थानमें पीडाको उपजा पीछे आप उपजता है । वात और पित्तसे प्रथम शिरमें पीडाको उपजा पीछे आप उपजता है, ऐसे तृतीयकज्वर तीन प्रकारका है ॥ १९२ ॥ अथ चातुर्थिक ज्वरलक्षण । चतुर्थो द्विविधो ज्ञेयो वातश्लेष्मात्मको ज्वरः ॥ जङ्घाभ्यां
( २०४ ) हारीतसंहिता [ तृतीयस्थाने- श्लेष्मको ज्ञेयः शिरसोऽनिलसम्भवः ॥ १९३ ॥ एवं विज्ञाय सद्द्वैद्यः कुर्यात्तत्र प्रतिक्रियाम् ॥ १९४ ॥ वात और कफसे उपजा चातुर्थिकज्वर दो प्रकारका है। कफका चातुर्थिकज्वर प्रथम जंघा- ओंसे उपजता है और वातका चातुर्थिकज्वर प्रथम शिरसे उपजता है ॥ १९३ ॥ ऐसे जानके कुशल वैद्य वहां क्रियाको करे ॥ १९४ ॥ अथ वेलाज्वरादिकका लक्षण। वेलाज्वरो रसगते रक्ते चकाहिकस्तथा ॥ मांसगोऽपि तृतीयः स्याच्चतुर्थोऽस्थिसमाश्रितः ॥ सर्वधातुगतो ज्ञेयो जीर्णो धातु- क्षयंकरः ॥ १९५ ॥ वेलाज्वरका स्थान रसमें होता है, एकाहिकज्वरका स्थान रक्तमें होता है, तृतीयकज्वरका थान मांसमें होता है और हड्डियोंमें चातुर्थिक ज्वरका स्थान होता है, सब धातुओंमें गमन करनेवाला जीर्णज्वर धातुओंको नष्ट करता है ॥ १९५ ॥ अथ भूतादिकसे उपजे रोग। भूतजे भूतविद्या स्याद्धाति शमताडनम् ॥ अभिशापाज्ज्वरो यस्य तस्य शान्तिः प्रतिक्रिया ॥ १९६ ॥ कामजे कामला पित्तेर्नयेच्च श्वसनं हितम् ॥ १९७ ॥ क्रोधजे पित्तजे वापि सद्वाक्यैरुपशामयत् ॥ ओषधीगन्धजैर्मूर्च्छा कारयेत्सेवनं हितम् ॥ १९८ ॥ भूतजज्वरमें भूतविद्यासे शांत करना, ताडना देनी ये हित हैं और ब्राह्मणके शापसे उपजे ज्वरमें शांति करानी हित है ॥ १९६ ॥ कामजज्वरमें कामला और पित्तकी चिकित्साकरके आश्वासन करना हित है ॥ १९७ ॥ क्रोधसे और पित्तसे उपजे ज्वरमें श्रेष्ठ वाक्योंसे शांति करना हित है । औषधीके गंधसे उपजे ज्वरमें मूर्छा होती है इसको दूर करनेके लिये हित पदार्थको सेवे ॥ १९८ ॥ अथ निदिग्धिकादि क्वाथ । निदिग्धिकानागरिकामृतानां काथं पिबेन्मिश्रितपिप्पलीकम् ॥ जीर्णज्वरारोचनकासशूलश्वासाग्निमान्द्यार्दितपीनसेषु ॥ १९९॥ कटेली, सोंठ, गिलोय इन्होंके काथमें पीपलका चूर्ण मिला पीवे । यह जीर्णज्वर, अरोचक, खांसी, शूल, श्वासरोग, मंदाग्नि, अर्दितरोग, पीनस इन्होंको नाशता है ॥ १९९ ॥
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( २०५ ) अथ गुडपिप्पली । कासाजीर्ण श्वासहृत्पाण्डुरोगे मन्दे वाग्नौ कामलारोचके च॥ तेषां शस्ता पिप्पली स्याद्गुडेन हन्ति नृणांजीर्णमाशु ज्वरंच २०० गुडमें संयुक्त करी पीपल खांसी, अजीर्ण, श्वास्रोग, पांडुरोग, मंदाग्नि, कामला, अरोचक, जीर्णज्वर इन्होंको शीघ्र हरती है ॥ २०० ॥ अथ लघुपंचमूलक्वाथ । लघुपञ्चमूलीकथितः कषायश्छिन्नोद्भवायाः सह पिप्पलीभिः॥ जीर्णज्वरे श्वासकफामयघ्नो मन्दाग्निशूलारुचिपीनसानाम्॥२०१ शालपर्णी, पिठवन, छोटी कटेली, बड़ी कटेली,गोखरू इन्होंके क्वाथको अथवा गिलोयके क्वाथमें पीपलका चूर्ण मिला पीवे तो जीर्णज्वर, श्वास, कफका रोग, मंदाग्नि,शूल, अरुचि, पीनस इन्होंका नाश होता है ॥ २०१ ॥ अथ जीर्णज्वरपर पटोलादि क्वाथ । पटोलपाठाकटुरोहिणीनां फलत्रय वत्सकनिम्बमोक्षाः ॥ द्राक्षामृताचन्दननागराणां क्वाथः पुराणज्वरनाशनाय ॥२०२॥ परवल, श्योनापाठा, कुटकी, हरड़े, बहेड़ा, आंवला, इंद्रजव, नींवकी छाल, मोखावृक्ष, दाख, गिलोय, चंदन और सोंठ, इनका क्वाथ पुराने ज्वरको नाशता है ॥ २०२ ॥ अथ विषमज्वरका औषध । सजीरकं गुडं भक्षेत्सगुडां वा हरीतकीम्॥सगुडांन्वा तिलान्भ- क्षेज्ज्वरे च विषमानुषे ॥२०३॥ सगुडं त्रिफलाक्वाथं संभक्षेद्वा गुडार्द्रकम्॥क्वाथोऽपि विषामाणान्तु ज्वराणां नाशकारकः२०४ गुडसहित जीराको अथवा गुडसहित हरडैको अथवा गुडहित तिलोंको खावे यह विषम ज्वरको नाशता है ॥२०३ ॥ गुडसहित अदरख अथवा गुडसहित त्रिफलाके क्वाथको पीवे यह विषमज्वरोंको नाशता है ॥ २०४ ॥ अथ चातुर्थिकज्वरका उपाय । वासाधात्रीफलं दारुपथ्यानागरसाधितः ॥ मधुना संयुतः क्वाथश्चातुर्थिकनिवारणः ॥ २०५ ॥ वांसा, आंवला, देवदार, हरडै, सूंठके क्वाथमें शहद डाल पीवे । यह चातुर्थिकज्वरको नाशता है ॥ २०५ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( २०६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ चातुर्थिकपर नस्य । अगस्तिपत्रं स्वरसैर्निहन्ति नस्ये च चातुर्थिकरोगमुग्रम् ॥ कासं श्रमं चापि शिरोरुजाञ्च नाशञ्च नस्यं च हितं नराणाम्॥२०६ अगस्तिवृक्षके स्वरसको नाकमें चढ़ानेसे भयंकर भी चातुर्थिकज्वर नाशको प्राप्त होता है और खांसी, श्रम, शिरकी पीडा इनका भी नाश होता है ॥ २०६ ॥ अथ विषमज्वरपर लशुनकल्क । रसोनकल्कं तिलतैलमिश्रं योऽश्नाति नित्यं विषमज्वरार्त्तः ॥ विमुच्यतेऽसौ विषमज्वरेभ्यो वातामयैश्चाप्यतिघोररूपैः॥२०७॥ जो विषमज्वरसे पीडितहुआ मनुष्य तिलोंके तेलसे युक्त किये लहसनके कल्कको नित्य खाता रहता है वह विषमज्वर और अत्यंत भयंकर वातके रोगोंसे मुक्त होताहै ॥ २०७ ॥ अथ विषमज्वरपर अष्टांगधूप । पलञ्च निम्बस्य दलानि कुष्ठं वचा गुडं गुग्गुलुसर्षपाणाम् ॥ हरीतकी सर्पिर्युतं च धूपं विनाशनं वै विषमज्वराणाम्॥२०८॥ नींवके पत्ते ४ तोले और कूट, वच, गुड, सरसों, हरड़ै, गूगल ये सब उन मानसे मिला महीन पीस घृतसे युक्तकर धूप देनेसे विषमज्वरोंका नाश होता है ॥ २०८ ॥ अथ वेलाज्वरआदिकोंका उपाय । सुरसामूलमावृत्य हस्ते बद्धः शुभ दिने ॥ वेलाज्वरादिकान् हन्ति भूतज्वरनिवारणः ॥ २०९ ॥ मुस्तामृतामलक्यश्च नागरं कण्टकारिका ॥ कणाचूर्णान्वितः क्वाथस्तथा मधुसमन्वितः ॥ ॥२१०॥ एकाहिकं वा वेलाद्यं ज्वरं जातं व्यपोहति ॥२११॥ रसोनबीजं विहाय खण्डं कृत्वा निशासु चा॥तक्रमध्ये विनि- क्षिप्य प्रभाते घृतसंयुक्तम् ॥ २१२ ॥ सेवितञ्च ज्वरान्हन्ति वेलाद्यान्देहधातुगान् ॥२१३॥ पिप्पलीवर्द्धमानञ्च पिबेत्क्षीरं रसायनम्॥महौषधं नागरञ्च धान्यं चन्दनवालुकम् ॥२१४ ॥ गुडूचिकापयः पिबत्तृतीयकज्वरापहम् ॥ अपामार्गस्य मूलञ्च नीलीमूलमथापि वा ॥ २१५ ॥ लोहितेन तु सूत्रेण आमस्त- कप्रमाणतः॥वामकर्णे कटौ बद्ध्वा ज्वरं हन्ति तृतीयकम्॥२१६॥
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( २०७ ) वानरेन्द्रमुखं दिव्यं तरुणादित्यतेजसम् ॥ ज्वरमेकाहिकं घोरं तत्क्षणादेव नश्यति ॥ २१७ ॥ तुलसीकी जड़को शुभदिनमें लाके हाथपर बांधे तब वेलाज्वर और भूतज्वरआदि नाशको प्राप्त होते हैं ॥ २०९ ॥ नागरमोथा, गिलोय, आंवला, सूंठ, कटेली इनका क्वाथ पीपलका चूर्ण और शहद मिला पीवे ॥ २१० ॥ इससे एकाहिकज्वर, वेलाआदिज्वर दूर होता है ॥ २११ ॥ लहसनके बीजोंको निकास और रात्रिमें टुकड़े बना तक्रके बीचमें स्थापित कर पीछे प्रभातमें घृतसे संयुक्त कर ॥ २१२ ॥ सेवे । यह वेलाआदि और देहके धातुगत आदि ज्वरोंको नाशता है ॥ २१३ ॥ वर्द्धमान पीपल, दूध, रसायन औषध, इनको पीवे और सूंठ, सफेद लहसन, धनियां, चंदन, नेत्रवाला इनको अलग अलग सेवे ये विषमज्वरको नाशते हैं ॥ २१४ ॥ गिलोयका रस तृतीयकज्वरको नाशता है, ऊंगाकी जड़को अथवा नीलकी जड़को ॥ २१५ ॥ शिरके प्रमाण लालसूत्रमें बांध पीछे वामे कानमें और कटीपर बांधनेसे तृतीयकज्वरका नाश होता है ॥ २१६ ॥ तरुणसूर्यके तेजके समान तेजवाला सुग्रीव नामक वानरोंका राजा उसके दिव्यमुखको देख घोररूपी एकाहिकज्वर शीघ्र नष्ट होजाता है ॥ २१७ ॥ अथ ज्वरनाशक हनुमान्का पूजन। वानराकृतिमालिख्य खटिकायाः पुनः शृणु ॥ गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपैरर्चयन्ति भिषग्वराः ॥ २१८ ॥ खड़ियासे वानरकी आकृतिको लिख गंध, पुष्प, चावलोंके अक्षत इनसे ज्वर हटानेके लिये वैद्यवर पूजा करते हैं ॥ २१८ ॥ अथ ज्वरनाशक मन्त्र । ओं ह्रां ह्रीं क्लीं सुग्रीवाय महाबलपराक्रमाय सूर्य्यपुत्रायामितत- जसे ऐकाहिकद्वयाहिकत्र्याहिकचातुर्थिकमहाज्वरभूतज्वरभय- ज्वरक्रोधज्वरवेलाज्वरप्रभृतिज्वराणां दह दह पच पच अवत अवत वानरराज ज्वराणां बन्ध बन्ध ह्रां ह्रीं हूं फट् स्वाहा । नास्ति ज्वरः । ज्वरापगमनसमर्थज्वरस्त्रास्यते ॥ २१९॥ ( मंत्र ) “ओंह्रांह्रींक्लीं सुग्रीवाय महाबलपराक्रमाय सूर्य्यपुत्रायामिततेजसे ऐकाहिकद्व्याहिक- त्र्याहिक चातुर्थिक महाज्वर भूतज्वर भयज्वर क्रोधज्वरवेलाप्रभृतिज्वराणां दहदह पचपच अवत अवत वानरराज ज्वराणां बंधबंध ह्रांह्रींहूं फट्स्वाहा । नास्ति ज्वरः । ज्वरापगमनसमर्थज्वर- स्त्रास्यते” इसमंत्रसे विषमज्वर दूर होजाता है ॥ २१९ ॥
(२०८) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ चार वर्णवाले ज्वरोंके चिह्न । पुनश्चात्र प्रवक्ष्यामि ज्वराणां रूपलक्षणम् ॥ २२० ॥ ज्वरोंके रूप और लक्षणको फिर कहता हूं ॥ २२० ॥ अथ ब्राह्मणज्वर । संतप्तकाञ्चनाभासो हुताशनसमप्रभः ॥ उद्दीनयज्ञोपवीती च रौद्रो ब्राह्मणरूपकः ॥ २२१ ॥ अच्छी तरह तपाये हुए सोनाके समान कांतिवाला, अग्निके समान प्रकाशित और भयंकर यज्ञोपवीत अर्थात् जनेऊवाला ऐसा रौद्रसंज्ञक ब्राह्मणवर्णवाला ज्वर होता है ॥ २२१ ॥ अथ क्षत्रियज्वर । जपाकुसुमसदृशाशो रौद्रदंष्ट्रान्वितस्तथा ॥ खड्गहस्तो महारौद्रो माहेन्द्रः क्षत्रियो मतः ॥२२२॥ जपाके फूलके समान प्रकाशवाला, भयंकर डाढ़ोंसे अन्वित और तलवारको हाथमें लिये हुए और महादारुण ऐसा माहेंद्रसंज्ञक ज्वर क्षत्रियवर्णवाला होता है ॥ २२२ ॥ अथ वैश्य ज्वर । पञ्चकप्रसवाभासतप्तकाञ्चनभूषितः ॥ दण्डहस्तो मध्यवेगी वैश्यो ज्वरेश्वरो मतः ॥२२३ ॥ पांच प्रकारके फूलोंके समान आकृतिवाला और तपायेहुये सोनासे भूषित हुआ, दंडको हाथमें लेनेवाला और मध्यमवेगवाला ऐसा ज्वरेश्वरसंज्ञक ज्वर वैश्यवर्णवाला कहाता है ॥ २२३ ॥ अथ शूद्र ज्वर । कृष्णमेघाञ्जनाकारस्तीक्ष्णदंष्ट्रोज्ज्वलाननः ॥ त्रिनेत्रो ज्वलनप्रभः कालः शूद्रो मतस्तथा ॥ २२४ ॥ काले मेघ और पर्वतके समान आकृतिवाला, तीक्ष्ण डाढ़ोंसे प्रकाशित मुखवाला, तीन नेत्रोंवाला, अग्निके समान कांतिवाला और कालरूप ऐसा ज्वर शूद्रवर्णवाला होता है ॥ २२४ ॥ अथ ब्राह्मणज्वरका लक्षण और शांति । तीक्ष्णवेगः क्षुधायुक्तः शुचिद्वेष्टा व्रतप्रियः॥ मूत्रञ्च किंशुका- भासं पाठशीलोऽतिजल्पकः ॥ २२५॥ बहुश्वासी तृषाक्रान्तो
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । (२०९) रौद्रब्राह्मणपीडितः ॥ तस्य स्नानं जपं होमं कृत्वा शान्तिः प्रपद्यते ॥ २२६ ॥ तीक्ष्ण वेगवाला, भूखसे युक्त, पवित्र, वैरको करनेवाला, व्रतमें प्यार करनेवाला, केशूके रंगके समान मूत्रको उतरनेवाला, पाठमें अभ्यासवाला और अत्यंत बोलनेवाला ॥ २२५ ॥ बहुत श्वासोंको लेनेवाला, तृषासे आक्रांत हुआ ऐसा मनुष्य रौद्रसंज्ञक ब्राह्मणवर्णवाले ज्वरसे पीड़ित जानना । उसकी शांति स्नान, जप, होमादिसे करे ॥ २२६ ॥ अथ क्षत्रियज्वरका लक्षण और शांति । तीक्ष्णज्वरोऽतितृष्णश्च रक्तमूत्रश्च मूत्र्यते ॥ कुरुते युद्धवार्त्ताश्च उत्तिष्ठति बलातुरः॥२२७॥तप्तनेत्रो महाश्वासः क्षुधया पीडि- तस्तथा॥मधुगन्धो मुखे स्वेदो माहेन्द्रक्षत्रियार्दितः॥२२८॥ तस्यादौ ग्रहहोमं तु देवतास्तवनं शुचिः ॥ दानैर्जपादिभिः कार्य्यैः प्राप्यते सिद्धिसङ्गमः ॥ २२९ ॥ तीक्ष्णज्वर हो, अत्यंत तृषा लगे, लालमूत्र उतरे, युद्धकी बातको करे, बलसे पीड़ितहुआ भी उठ खडा हो ॥२२७॥ गर्वितनेत्रोंवाला हो, महाश्वाससे संयुक्त हो, सबका- लमें क्षुधासे पीड़ित हो, मधुसरीखे गंधसे युक्त हो और मुखपर पसीनेसे संयुक्त हो ऐसा मनुष्य माहेंद्रसंज्ञक क्षत्रियवर्णवाले ज्वरसे पीड़ित जानना ॥ २२८ ॥ इसकी शांतिके लिये आदिमें ग्रहोंका होम, देवताकी स्तुति, दान, जप इन्होंका होना जरूरी है ॥ २२९॥ अथ वैश्यज्वरका लक्षण और शांति । मध्यवेगः पीतगात्रः स्वप्नशीलोऽरुचिस्तथा॥शीतपवनहृदुष्णः कण्ठस्वेदोऽतिविह्वलः ॥ २३० ॥ बहुमूत्री भक्तियुक्तो मौनी पीतान्तलोचनः॥नातितृष्णातुरः स्निग्धः स विज्ञेयो ज्वरेश्वरः ॥ २३१ ॥ तत्र स्वस्त्ययनातिथ्यं द्विजदैवतपूजनम् ॥ जपहो- मादिकं सर्वं कर्त्तव्यं शान्तिहेतुना ॥ २३२ ॥ मध्यमवेगवाला, पीले शरीरवाला, शयनको करनेवाला और अरुचिसे युत हुआ, शीतलपवनको वर्जनेवाला, गरमस्वभाववाला, कंठमें पसीनासे संयुक्तहुआ और अत्यंत विह्वल हुआ ॥ २३० ॥ बहुतसे मूत्रको उतारनेवाला, भक्तिसे युक्त और मौनी और नेत्रोंके अंतमें पीलेपनसे संयुक्त और अत्यंत तृषासे नहीं पीडित हुआ, चिकना शरीरवाला ऐसा १४
( २१० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- मनुष्य ज्वरेश्वरसंज्ञक वैश्यवर्णवाले ज्वरसे पीडित जानना ॥ २३१ ॥ इसमें शांतिके लिये कल्याणके कर्म, अतिथिकी सेवा, ब्राह्मण और देवतोंकी पूजा, जप, होम, इन सबोंका करना जरूरी है ॥ २३२ ॥ अथ शूद्रज्वरका लक्षण और शांति । हृच्छूलश्वातिसारी वा मत्स्यगन्धाङ्गलेपनः ॥ उन्मादी चाति- तृप्ताक्षो रतेषु विकलेन्द्रियः ॥ २३३ ॥ प्रणयी त्वध्वनौ भीरुर्मासं नैवाभिकाङ्क्षया ॥ कालभृङ्गारकेणापि शूद्रे सिद्धिर्न जायते ॥ २३४ ॥ हृदयमें शूलवाला, अतीसारसे संयुक्त हुआ, मछलीके गंधके समान गंधवाला और अंगोंपर लेप करनेवाला, उन्मादसे संयुक्त और अतितृप्तहुए नेत्रोंवाला और भोगमें विकलहुई इंद्रियोंवाला ॥ २३३ ॥ नम्रतासे युक्त हुआ और रस्तेमें चलनेसे डरनेवाला और इच्छासे ग्रासको नहीं लेनेवाला और भृंगरा सरीखे रूपवाला ऐसा मनुष्य शूद्रज्वरसे पीड़ित होता है इसमें सिद्धि होती नहीं ॥ २३४ ॥ अथ सर्वरोगोंपर उपचार । स्नानं दानजपं सुरार्चनविधिर्होमादयः प्रीतता भूतानाञ्च विशेष- णेन बहुधा तृप्तिं च कुर्यात्ततः ॥ गोभूमिं कनकान्नपानवि- धिना दानेन शान्तिर्भवेत्सर्वेषां च रुजां विनाशनमिदं शंसन्ति सत्यव्रताः ॥ २३५ ॥ इस ज्वरकी शांतिके लिये स्नान,दान, जप, देवतोंकी पूजा, होम आदिको करना और मनु- ष्योंको प्रसन्नता और भोजनसे तृप्त करना, गाय, पृथिवी, सोना, अन्न, पानी इनका दान करना, ऐसे करनेसे सब रोगोंकी शांति होती है ऐसे सत्यव्रतवाले मुनि कहते हैं ॥ २३५ ॥ अथ ज्वरवालेको पथ्यआहारादि । वेगं कृत्वा विषं यद्वदाशये लीयते बलम् ॥ कुप्यते प्रबलं भूयः काले दोषो विषं तथा ॥२३६॥ शालिषष्टिकभक्तानां यूषं मुद्गा- ढकीषु च ॥ पूर्वोक्तानि च शाकानि वातघ्नानि भवन्ति हि ॥ ॥ २३७ ॥ शतपुष्पा च जीवन्ती तण्डुलीय़कवास्तुकम् ॥ घृतेन भाजिका सिद्धा शाकपत्राण्यमूनि च ॥ २३८॥ लाव- तित्तिरमांसादिवात्तकािनां तथातुरे॥ मृगच्छिकरिकाद्यानि जाङ्ग-
॰अ० २ ] भाषाटीकासमेता । (२११) लानि प्रयोजयेत् ॥२३९॥ कोशातकी पटोलं च शुण्ठीकं च हितं भवेत् ॥ जैसे विषवेगको करके आशयमें लीन होके फिर समयपर अत्यंत कुपित होता है तैसे ही दोष भी समयपर फिर कुपित होता है ॥ २३६ ॥ शालिचावल, सांठीचावल, मूंग और अरहरका यूष और पूर्वोक्त शाक ये सब वातको नाशते हैं ॥२३७॥ सौंफ, जीवंती, चौलाई, बथुवा, इन्होंकी भाजीको घृतमें सिद्धकर प्रयुक्त करे ॥ २३८ ॥ लावा, तीतर, बत्तक, मृग, छिक्कर इन आदि जांगलदेशके जीवोंके मांसोंको भी रोगीको देवे ॥ २३९ ॥ तोरी, परवल, सूंठ ये भी हित हैं ॥ अथ ज्वरवालेकूं अपथ्य । वर्जयेद्विदलान्नानि विदाहीनि गुरूणि च ॥ २४०॥ न पिच्छ- लानि तैलानि तथाम्लानि च वर्जयेत् ॥ दधिमस्तुविशालानि क्षुद्रान्नानि भिषग्वरः ॥ २४१ ॥ बहूदकञ्च ताम्बूलं घृतं वापि सुरामपि ॥ २४२ ॥ क्रोधं शोकञ्च त्यक्त्वा वै सदा सौख्यं विभुञ्जते ॥ न कुर्याज्जागरं रात्रौ दिवास्वप्नञ्च वर्जयेत्॥२४३॥ शकटवाजिकरिद्विपिवाहनं प्रबलं परिवर्जयेत्तु सततम्॥ ज्वरि- णमाशु सुखं बुभुजे सुधीः शुभविधाननिधान उपस्थितः २४४॥ विदलसंज्ञक और दाहको करनेवाले और भारी ऐसे अन्नोंको त्यागे ॥ २४० ॥ कफकारी तेल सेवने हुए और खट्टे ऐसे शाकोंको भी वर्जे, दही,दहीका पानी, रसाला, क्षुद्रअन्न ॥२४१॥ बहुत पानी, नागरपान, घृत, मदिरा ॥ २४२ ॥ क्रोध, शोक इन्होंको त्यागके रोगी सबका- लमें सुखको प्राप्त होता है, रात्रिमें जागे नहीं और दिनमें सोवे नहीं ॥ २४३ ॥ गाडी, घोड़ा, हस्ती, गेंडा इन्होंकी सवारीको रोगी निरंतर त्यागे एसे त्यागनेसे ज्वरवालेको सुख उपजता है ॥२४४ ॥ अथ ज्वरमुक्तोंका वर्तना । व्यायामं च व्यवायं च अशनं रात्रिजागरम् ॥ ज्वरमुक्तो न सेवेत तदा सम्पद्यते सुखम् ॥२४५॥इति आत्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे तृतीयस्थाने ज्वरचिकित्सानाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ ज्वरसे मुक्त हुआ मनुष्य कसरत, स्त्रीसंग, अति भोजन, रात्रिको जागना इन्होंको नहीं सेवे,
( २१२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- तब सुखको प्राप्त होता है ॥ २४९ ॥ इति बेरीनिवासिवुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनु- वादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने ज्वरचिकित्सानाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ तृतीयोऽध्यायः ३. अथातिसारचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अथातीसारविज्ञानं भेषजं शृणु पुत्रक ॥ ज्वरजो वातिसारश्च भेषजं चोपदिष्यते॥१॥ दोषसंशमनं कि- ञ्चित् किञ्चिच्च धातुदूषणम्॥स्वस्थवृत्तौ मतं किञ्चिद्द्रव्यंत्रिविध- मुच्यते ॥ २ ॥तच्च दैवपथाश्रयं युक्तिपथाश्रयं सत्त्वावजयञ्च॥ मन्त्रौषधमणिमंगलबल्युपहारहोमनियमप्रायश्चित्तोपवासस्व-- स्त्ययनप्रणिधानादीति दैवपथाश्रयम् ॥ आहारव्यवहारौषधद्र- व्याणां योजनेति युक्तिपथाश्रयम् ॥ अहितेभ्योऽर्थेभ्यो मनो- निग्रह इति सत्त्वावजयञ्च ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--हे पुत्र! अतीसारविज्ञान और औषधको सुन--ज्वरातिसार हो अथवा अतीसार हो तहां औषधका उपदेश कियाजाता है ॥ १ ॥ दोषको शमन करनेवाला कोई औषध है और धातुको दूषित करनेवाला कोई औषध है और स्वस्थवृत्तिमं कोई औषध माना है ऐसे औषध तीन प्रकारके हैं ॥ २ ॥ दैवपथाश्रय, युक्तिपथाश्रय, सत्त्वावजय ऐसे औषध तीन प्रकारके हैं। मन्त्र, औषध, मणि, मंगल, वलि, भेट, होम, नियम, प्रायश्चित्त, व्रत, स्वस्त्ययन, प्रणिधान आदि दैवपथाश्रय अर्थात् देवके मार्गसे आश्रित हुआ औषध कहाता है. आहार, व्यवहार, औषध इन्होंकी योजना की जावे वह युक्तिपथाश्रय अर्थात् युक्तिके मार्गसे आश्रित हुआ ओषध कहाता है. अहित अर्थोंसे मनका निग्रह होना यह सत्त्वावजय ओषध कहाता है ॥ ३ ॥ अथ अतिसारका लक्षण । स्निग्धातिशीतगुरूशीतलपिच्छलान्नं दुष्टाशनातिविषमाशनपा- नभक्ष्यम्।अद्यादजीर्णमथ शोकविषैर्भयैर्वा शोकार्त्तिदुष्टपयसा तु विपर्य्ययेषु ॥४॥ दौर्बल्यतां विषमभोजनकेन चाप्सु संभि- द्यते मलमजीर्णं निहन्ति चाग्निः॥सञ्जायते हि मनुजस्य तदा- तिसारो हत्वोदरानिं मनुजस्य तदातिसारः ॥ ५ ॥ सञ्जायते