भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 232

( २०० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ अंतर्दाहका कारण । अन्ते पित्तं यदा तिष्ठेद्वाह्ये श्लेष्मसमीरणौ ॥ तदान्तर्दाहशोषः स्याद्वाह्ये सस्वेदशीतता ॥ १६६ ॥ जब शरीरके भीतर पित्त स्थित होजाता है और शरीरके बाहर कफ और वात स्थित होता है तब शरीरके भीतर दाह और शोष उपजता है और शरीरके बाहर पसीना और शीत- लता होती है ॥ १६६ ॥ अथ अंतर्दाहकी चिकित्सा । तस्यामृता पयः क्वाथं मधुपिप्पलिसंयुतम्॥ पाययेदाशु मुच्येत ज्वराद्वै सान्निपातिकात् ॥ १६७॥ अथवातिविषा वालं नागरं घनपर्पटम्॥ क्वाथो वा शर्करायुक्तश्चान्तर्दाहोपशान्तये॥१६८॥ उसको गिलोयके काथमें शहद और पीपलका चूर्ण मिला पान करावे तब शीघ्र ही सन्निपात ज्वरसे छुट जाता है ॥ १६७ ॥ अथवा अतीस, नेत्रवाला, सूंठ, नागरमोथा, पित्तपा- पडा इनका काथ बना उसमें खांड मिला पीवे तब शरीरके भीतरकी दाह शांत होती है ॥ १६८ ॥ अथ बाह्यदाहका कारण और चिकित्सा । बाह्ये पित्तं यदा तिष्ठेदन्ते वा कफमारुतौ ॥ तेनोष्णत्वं शरी- रस्य अन्ते शैत्यं च जायते॥१६९॥ तस्य शट्यादिकं क्वाथं प्रयुञ्जीयात्कफापहम् ॥ १७० ॥ जब शरीरके बाहिर पित्त स्थित हो और शरीरके भीतर कफ और वात स्थित होवे तब शरीर गरम होता है, हाथ और पैरोंमें शीतलता होती है॥१६९॥ तिसको कचूरंआदि पूर्वोक्त क्वाथका पान कराना, यह कफको शांत करता है ॥ १७० ॥ अथ शरीर शीतल और अर्ध गर्म होनेका कारण और चिकित्सा । यस्योर्ध्वाङ्गे वातकफावधोगं पित्तमेव च ॥ तेनार्द्धं शीतलं गात्रमर्द्धं चोष्णं च जायते ॥ १७१ ॥ तस्य रास्नादिकं क्वाथं प्रयुञ्जीयात्तथोष्णकम् ॥ १७२ ॥ यस्योर्ध्वं रक्तपित्तञ्च मध्ये वातकफावुभौ॥तेनोर्ध्वं जायते चोष्णमधः शीतं प्रजायते ॥१७३॥ तस्य नागरादिक्वाथंयुञ्जीयाद्भिषगुत्तमः ॥१७४ ॥ १ कचूर, चिरायता, कुटकी, इन्द्रायण, गिलोय, अतीस, दोनो कटेली, सौंठ, पुष्करमूल, जवासा, रायसन, देवदारु, गजपीपल ।