हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( २०१ ) जिसके ऊपरके अंगोंमें वात और कफकी स्थिति हो और नीचेके अंगमें पित्तकी स्थितिहो तिसकरके आधा शरीर गरम रहता है और आधा शरीर शीतल रहता है ॥ १७१ ॥ तिसको पूर्वोक्त गर्मगर्म रास्नादि काथका पान कराना ॥ १७२ ॥ जिसके ऊपरले अंगोंमें रक्त और पित्तहो और मध्यमें वात और कफ हो तिससे ऊपरका शरीर गर्म रहता है और नीचेका शरीर शीतल रहता है ॥ १७३ ॥ उसको पूर्वोक्त शुंठ्यादि काथका पान कराना ॥ १७४ ॥ यस्योष्मा दृश्यत चापि मन्दस्रष्टा च जायते॥ बाह्यवेगं विजा- नीयाज्ज्वरः साध्यो विजानता ॥ १७५ ॥ यस्यान्ते जायते चोष्मा तृष्णा दाहः शिरोव्यथा॥ गम्भीरवेगं जानीयात्कृच्छ्र- साध्यो नृणामपि ॥ १७६ ॥ तस्य कुर्यात्प्रतीकारं योगो- ऽष्टादशको नृणाम् ॥ १७७ ॥ जिसके गरमाई हो और ज्वरका मन्दवेग हो उसको बाह्यवेगज्वर कहते हैं । यह ज्वर साध्य होता है ॥ १७५ ॥ जिसके हाथ और पैरमें गरमाई हो और तृषा, दाह, शिरमें पीड़ा ये उपजें तिसको गंभीरवेगज्वर कहते हैं यह मनुष्योंके कष्टसाध्य होता है ॥ १७६॥ उसके लिये अष्टा- दशांग क्वाथ काफी है ॥ १७७ ॥ अथ शीतल अंगमें गरम करनेकी चिकित्सा । अन्ते पित्तं यदा तिष्ठेद्देहे वातकफावुभौ ॥ तेन शैत्यं शरीरस्य उष्णत्वं करपादयोः ॥ १७८ ॥ तस्य रास्नादिकः क्वाथः प्रदेयः पिप्पलीयुतः ॥ १७९ ॥ जब हाथ और पैरमें पित्तकी स्थिति हो, शरीरमें वात और कफकी स्थिति हो उस करके शरीर शीतल रहता है, हाथ और पैरोंमें गर्माई जाननी ॥ १७८ ॥ उसको रास्नादि काथमें पीपलका चूर्ण मिला पान कराना ॥ १७९ ॥ अथ गर्मीका उपचार । देहे पित्तं यदा तिष्ठदंते वातकफावुभौ ॥ तस्योष्मा जायते देहे शीतत्वं करपादयोः ॥ १८० ॥ तस्य द्राक्षादिकः क्वाथः प्रदेयो गुडकान्वितः ॥ १८१ ॥ जिसके देहमें पित्त स्थितहो, हाथ और पैरोंमें वायु कफ स्थित होवे तिसका देह गर्म रहता है हाथ और पैर शीतल रहते हैं ॥ १८० ॥ उसको द्राक्षादिक्वाथमें गुड़मिला पान कराना १८१ १ हा. सं. १९४ पृ० ।