भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

( २०२ ) हारितसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ शीतत्वका उपचार । यत्र यत्र भवेच्छैत्यं तत्र स्वेदो विधीयते ॥ नात्युष्णे स्वेदनं कार्यं ज्वरस्यास्य विजानता ॥ १८२ ॥ और जहां जहां शीतलता होवे वहां २ पसीना देना चाहिये। इस सन्निपात ज्वरको जाननेवाले वैद्यको अत्यन्त गर्माईमें पसीना नहीं देना चाहिये ॥ १८२ ॥ ज्वरादिकोंका कारण वायु है। कफपित्तेन निश्चेष्टो भवत्येवानिलः सदा ॥ तस्मादेवानिलाद्रोगाः सम्भवन्ति ज्वरादयः ॥ १८३ ॥ कफ और पित्तसे चेष्टा करके रहित हुआ वात सब कालमें रहता है उस कारण करके वात- से ही ज्वरआदि सब रोग उपजते हैं ॥ १८३ ॥ अथ ज्वरमुक्तिका लक्षण । भ्रमः शैत्यं विह्वलता कम्पो विड्भेदनं क्लमः ॥ श्रमः स्वेदो जल्पनञ्च ज्वरमोक्षे भवन्ति च ॥ १८४ ॥ भ्रम, शीतलता, विह्वलपना, कंप, विष्ठाका पतलापन, थकानसी, परिश्रम, पसीना, बोलना ये सब ज्वरके दूर होनेके समय होते हैं ॥ १८४ ॥ अथ ज्वर उतरनेका लक्षण । प्रस्वेदकण्डू च शिरा च पुष्टा तथा मुखेषु क्षवथुर्लघुत्वम् ॥ अन्नाभिलाषो विपुलेन्द्रियश्च गतक्लमो गतरुजो मनुष्यः ॥ १८५ ॥ पसीना आवे, खाज चले और नाड़ी पुष्ट हो जावे और मुखमें छींक आवे और शरीरका हलकापन हो और अन्नकी इच्छा हो और इन्द्रियें प्रसन्न हो जावें, ग्लानि और पीड़ा जाती रहे तब जानो ज्वर उतरा ॥ १८५ ॥ अथ ज्वर नहीं उतरनेका और लौटानेका लक्षण । विमुक्तस्यापि हि शिरोगुरुत्वं नव मुञ्चति ॥ अविमुक्तं विजानीयाज्ज्वरः पुनरुपैति तम् ॥ १८६ ॥ ज्वरसे मुक्त हुआ मनुष्य शिरके भारीपनको नहीं छोड़े तब जानो कि अभी ज्वर नहीं छूटा और उस मनुष्यको फिर ज्वर उपजेगा ऐसा जान ले ॥ १८६ ॥ अथ विषमज्वरका लक्षण और चिकित्सा । यदि धातुगतश्चैव ज्वरो देहे प्रपद्यते॥विषमज्वरं विजानीयात्स