हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] भाषाटीकासमेत। ( २०३ )
च ज्ञेयश्चतुर्विधः ॥ १८७ ॥ एकाहिको व्याहिकश्च त्र्याहिकश्च तथापरः ॥ वेलाज्वरश्चतुर्थोऽपि विजानीयाद्विचक्षणः ॥१८८॥ जो देहके धातुओंमें ज्वर प्राप्त हो उसको विषमज्वर जानना वह चार प्रकारका है ॥१८७॥ एकाहिक अर्थात् दिनमें एक वार आनेवाला, द्वयाहिक अर्थात् दूसरे दिन आनेवाला त्र्याहिक अर्थात् तीसरे दिन आनेवाला और समयपै चौथे दिन आनेवाला चातुर्थिक वैद्योंको जानना चाहिये ॥ १८८ ॥ अथ एकाहिकज्वरका लक्षण। शीतश्च पूर्वं भवति पश्चादुष्णश्च जायते ॥ स साध्यो मनुजे प्रोक्तः शीघ्रं सिध्यति भेषजः ॥ १८९ ॥ पश्चाच्च दाहमाप्नोति ज्वरो भवति दारुणः ॥ सोऽपि न मुच्यते शीघ्रं ज्वरो धातु- क्षयङ्करः ॥ १९०॥ जिसमें प्रथम शीत उपजे और पीछे गरमाई उपजे वह साध्यज्वर जानना । यह औषधोंसे शीघ्र जाता रहता है ॥ १८९ ॥ भयंकर ज्वर होके पीछे दाहसे संयुक्त हो वह शीघ्र नहीं जाता है । यह ज्वर धातुओंका क्षय करता है ॥ १९० ॥ अथ तृतीय ज्वर लक्षण । त्रिकोरुकट्यां रुजवातपित्तं स्याच्च पित्तं मस्तके रुग्भ्रमश्च ॥ पृष्ठे तनुश्लेष्मरुजाकरं स्यान्त्रिधा तृतीयज्वरलक्षणं तत्॥१९१॥ कफपित्तात्त्रिकग्राही पृष्ठाद्वातकफात्मकः ॥ वातपित्ताशिरोग्राही त्रिविधः स्यात्तृतीयकः ॥ १९२ ॥ कटिप्रांत, जांघ, कटि इन्होंनेसे वात और पित्तसे पीडा हो और मस्तकमें पित्तसे पीडा हो और भ्रम उपजे और पृष्ठभागमें सूक्ष्म कफ पीडाको करता हो ऐसे तृतीय ज्वरका लक्षण तीन प्रकारका है ॥ १९१ ॥ वात और कफसे उपजा तृतीयकज्वर प्रथम कटिप्रांतमें पीडाको उपजा पीछे आप उपजता है, वात और कफसे उपजा तृतीयकज्वर प्रथम पृष्ठ नितंब स्थानमें पीडाको उपजा पीछे आप उपजता है । वात और पित्तसे प्रथम शिरमें पीडाको उपजा पीछे आप उपजता है, ऐसे तृतीयकज्वर तीन प्रकारका है ॥ १९२ ॥ अथ चातुर्थिक ज्वरलक्षण । चतुर्थो द्विविधो ज्ञेयो वातश्लेष्मात्मको ज्वरः ॥ जङ्घाभ्यां