भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

( २०४ ) हारीतसंहिता [ तृतीयस्थाने- श्लेष्मको ज्ञेयः शिरसोऽनिलसम्भवः ॥ १९३ ॥ एवं विज्ञाय सद्द्वैद्यः कुर्यात्तत्र प्रतिक्रियाम् ॥ १९४ ॥ वात और कफसे उपजा चातुर्थिकज्वर दो प्रकारका है। कफका चातुर्थिकज्वर प्रथम जंघा- ओंसे उपजता है और वातका चातुर्थिकज्वर प्रथम शिरसे उपजता है ॥ १९३ ॥ ऐसे जानके कुशल वैद्य वहां क्रियाको करे ॥ १९४ ॥ अथ वेलाज्वरादिकका लक्षण। वेलाज्वरो रसगते रक्ते चकाहिकस्तथा ॥ मांसगोऽपि तृतीयः स्याच्चतुर्थोऽस्थिसमाश्रितः ॥ सर्वधातुगतो ज्ञेयो जीर्णो धातु- क्षयंकरः ॥ १९५ ॥ वेलाज्वरका स्थान रसमें होता है, एकाहिकज्वरका स्थान रक्तमें होता है, तृतीयकज्वरका थान मांसमें होता है और हड्डियोंमें चातुर्थिक ज्वरका स्थान होता है, सब धातुओंमें गमन करनेवाला जीर्णज्वर धातुओंको नष्ट करता है ॥ १९५ ॥ अथ भूतादिकसे उपजे रोग। भूतजे भूतविद्या स्याद्धाति शमताडनम् ॥ अभिशापाज्ज्वरो यस्य तस्य शान्तिः प्रतिक्रिया ॥ १९६ ॥ कामजे कामला पित्तेर्नयेच्च श्वसनं हितम् ॥ १९७ ॥ क्रोधजे पित्तजे वापि सद्वाक्यैरुपशामयत् ॥ ओषधीगन्धजैर्मूर्च्छा कारयेत्सेवनं हितम् ॥ १९८ ॥ भूतजज्वरमें भूतविद्यासे शांत करना, ताडना देनी ये हित हैं और ब्राह्मणके शापसे उपजे ज्वरमें शांति करानी हित है ॥ १९६ ॥ कामजज्वरमें कामला और पित्तकी चिकित्साकरके आश्वासन करना हित है ॥ १९७ ॥ क्रोधसे और पित्तसे उपजे ज्वरमें श्रेष्ठ वाक्योंसे शांति करना हित है । औषधीके गंधसे उपजे ज्वरमें मूर्छा होती है इसको दूर करनेके लिये हित पदार्थको सेवे ॥ १९८ ॥ अथ निदिग्धिकादि क्वाथ । निदिग्धिकानागरिकामृतानां काथं पिबेन्मिश्रितपिप्पलीकम् ॥ जीर्णज्वरारोचनकासशूलश्वासाग्निमान्द्यार्दितपीनसेषु ॥ १९९॥ कटेली, सोंठ, गिलोय इन्होंके काथमें पीपलका चूर्ण मिला पीवे । यह जीर्णज्वर, अरोचक, खांसी, शूल, श्वासरोग, मंदाग्नि, अर्दितरोग, पीनस इन्होंको नाशता है ॥ १९९ ॥