हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- मनुष्य ज्वरेश्वरसंज्ञक वैश्यवर्णवाले ज्वरसे पीडित जानना ॥ २३१ ॥ इसमें शांतिके लिये कल्याणके कर्म, अतिथिकी सेवा, ब्राह्मण और देवतोंकी पूजा, जप, होम, इन सबोंका करना जरूरी है ॥ २३२ ॥ अथ शूद्रज्वरका लक्षण और शांति । हृच्छूलश्वातिसारी वा मत्स्यगन्धाङ्गलेपनः ॥ उन्मादी चाति- तृप्ताक्षो रतेषु विकलेन्द्रियः ॥ २३३ ॥ प्रणयी त्वध्वनौ भीरुर्मासं नैवाभिकाङ्क्षया ॥ कालभृङ्गारकेणापि शूद्रे सिद्धिर्न जायते ॥ २३४ ॥ हृदयमें शूलवाला, अतीसारसे संयुक्त हुआ, मछलीके गंधके समान गंधवाला और अंगोंपर लेप करनेवाला, उन्मादसे संयुक्त और अतितृप्तहुए नेत्रोंवाला और भोगमें विकलहुई इंद्रियोंवाला ॥ २३३ ॥ नम्रतासे युक्त हुआ और रस्तेमें चलनेसे डरनेवाला और इच्छासे ग्रासको नहीं लेनेवाला और भृंगरा सरीखे रूपवाला ऐसा मनुष्य शूद्रज्वरसे पीड़ित होता है इसमें सिद्धि होती नहीं ॥ २३४ ॥ अथ सर्वरोगोंपर उपचार । स्नानं दानजपं सुरार्चनविधिर्होमादयः प्रीतता भूतानाञ्च विशेष- णेन बहुधा तृप्तिं च कुर्यात्ततः ॥ गोभूमिं कनकान्नपानवि- धिना दानेन शान्तिर्भवेत्सर्वेषां च रुजां विनाशनमिदं शंसन्ति सत्यव्रताः ॥ २३५ ॥ इस ज्वरकी शांतिके लिये स्नान,दान, जप, देवतोंकी पूजा, होम आदिको करना और मनु- ष्योंको प्रसन्नता और भोजनसे तृप्त करना, गाय, पृथिवी, सोना, अन्न, पानी इनका दान करना, ऐसे करनेसे सब रोगोंकी शांति होती है ऐसे सत्यव्रतवाले मुनि कहते हैं ॥ २३५ ॥ अथ ज्वरवालेको पथ्यआहारादि । वेगं कृत्वा विषं यद्वदाशये लीयते बलम् ॥ कुप्यते प्रबलं भूयः काले दोषो विषं तथा ॥२३६॥ शालिषष्टिकभक्तानां यूषं मुद्गा- ढकीषु च ॥ पूर्वोक्तानि च शाकानि वातघ्नानि भवन्ति हि ॥ ॥ २३७ ॥ शतपुष्पा च जीवन्ती तण्डुलीय़कवास्तुकम् ॥ घृतेन भाजिका सिद्धा शाकपत्राण्यमूनि च ॥ २३८॥ लाव- तित्तिरमांसादिवात्तकािनां तथातुरे॥ मृगच्छिकरिकाद्यानि जाङ्ग-