हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] भाषाटीकासमेता । (२०९) रौद्रब्राह्मणपीडितः ॥ तस्य स्नानं जपं होमं कृत्वा शान्तिः प्रपद्यते ॥ २२६ ॥ तीक्ष्ण वेगवाला, भूखसे युक्त, पवित्र, वैरको करनेवाला, व्रतमें प्यार करनेवाला, केशूके रंगके समान मूत्रको उतरनेवाला, पाठमें अभ्यासवाला और अत्यंत बोलनेवाला ॥ २२५ ॥ बहुत श्वासोंको लेनेवाला, तृषासे आक्रांत हुआ ऐसा मनुष्य रौद्रसंज्ञक ब्राह्मणवर्णवाले ज्वरसे पीड़ित जानना । उसकी शांति स्नान, जप, होमादिसे करे ॥ २२६ ॥ अथ क्षत्रियज्वरका लक्षण और शांति । तीक्ष्णज्वरोऽतितृष्णश्च रक्तमूत्रश्च मूत्र्यते ॥ कुरुते युद्धवार्त्ताश्च उत्तिष्ठति बलातुरः॥२२७॥तप्तनेत्रो महाश्वासः क्षुधया पीडि- तस्तथा॥मधुगन्धो मुखे स्वेदो माहेन्द्रक्षत्रियार्दितः॥२२८॥ तस्यादौ ग्रहहोमं तु देवतास्तवनं शुचिः ॥ दानैर्जपादिभिः कार्य्यैः प्राप्यते सिद्धिसङ्गमः ॥ २२९ ॥ तीक्ष्णज्वर हो, अत्यंत तृषा लगे, लालमूत्र उतरे, युद्धकी बातको करे, बलसे पीड़ितहुआ भी उठ खडा हो ॥२२७॥ गर्वितनेत्रोंवाला हो, महाश्वाससे संयुक्त हो, सबका- लमें क्षुधासे पीड़ित हो, मधुसरीखे गंधसे युक्त हो और मुखपर पसीनेसे संयुक्त हो ऐसा मनुष्य माहेंद्रसंज्ञक क्षत्रियवर्णवाले ज्वरसे पीड़ित जानना ॥ २२८ ॥ इसकी शांतिके लिये आदिमें ग्रहोंका होम, देवताकी स्तुति, दान, जप इन्होंका होना जरूरी है ॥ २२९॥ अथ वैश्यज्वरका लक्षण और शांति । मध्यवेगः पीतगात्रः स्वप्नशीलोऽरुचिस्तथा॥शीतपवनहृदुष्णः कण्ठस्वेदोऽतिविह्वलः ॥ २३० ॥ बहुमूत्री भक्तियुक्तो मौनी पीतान्तलोचनः॥नातितृष्णातुरः स्निग्धः स विज्ञेयो ज्वरेश्वरः ॥ २३१ ॥ तत्र स्वस्त्ययनातिथ्यं द्विजदैवतपूजनम् ॥ जपहो- मादिकं सर्वं कर्त्तव्यं शान्तिहेतुना ॥ २३२ ॥ मध्यमवेगवाला, पीले शरीरवाला, शयनको करनेवाला और अरुचिसे युत हुआ, शीतलपवनको वर्जनेवाला, गरमस्वभाववाला, कंठमें पसीनासे संयुक्तहुआ और अत्यंत विह्वल हुआ ॥ २३० ॥ बहुतसे मूत्रको उतारनेवाला, भक्तिसे युक्त और मौनी और नेत्रोंके अंतमें पीलेपनसे संयुक्त और अत्यंत तृषासे नहीं पीडित हुआ, चिकना शरीरवाला ऐसा १४