हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- जीवता और वह वैद्य पूजाको प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १५१ ॥ सन्निपातरूपी समुद्रमें पड़े हुए रोगी मनुष्यको जो वैद्य उद्धार करता है उस मनुष्यने क्या नहीं किया और धर्म, यश, तथा विनय करके युक्त वह वैद्य इस भूतलमें कौनसी पूजाको नहीं पाता है ? अर्थात् सर्वत्र य होता है ॥ १५२ ॥ अथ कर्णमूल ( शोज़ा ) का निदान और चिकित्सा । वातपित्तकफैस्त्रिभिर्युक्तस्तथा त्रिदोषजः॥ स च रक्तेन संयुक्तो ज्वरः स्यात्सान्निपातिकः ॥१५३॥ न रक्तेन विना विद्धि ज्वरं वै सान्निपातिकम्॥क्वाथैः पाचनकैर्दोषः प्रशमं यान्ति मानवे ॥ १५४ ॥ तस्मात्प्रशमिते दोषे रक्तं नैव विलीयते ॥ तेनैव जायते शोफः कर्णमूले तु दारुणः ॥१५५॥ तस्मात्तस्य प्रती- कारं कुर्य्याद्रक्तविरेचनम् ॥ जलौकालावुशृङ्गैस्तु ततश्च लेपनं हितम् ॥ १५६ ॥ वातं, पित्त, कफ इन तीनोंसे युक्त त्रिदोषज्वर होता है और रक्तसे संयुक्त हुआ यही ज्वर सन्निपात कहाता है ॥ १५३ ॥ रक्तके विना सन्निपात ज्वरको नहीं जानना । क्वाथ और पाचनसंज्ञक क्वाथोंसे मनुष्यके तीनों दोष शान्त हो जाते हैं ॥ १५४ ॥ इस कारणसे दोष शान्त भी हो जाते हैं परन्तु रक्त नहीं शान्त होता उसकरके कानके जड़में भयंकर शोजा उप- जता है ॥ १५५ ॥ इससे उसकी चिकित्सा रक्तका निकालना है जोंक, तुंबी, शींगी, इनसे रक्तको निकासे पीछे लेप कराना ॥ १५६ ॥ अथ कर्णशोथके ऊपर लेप । बीजपूरकमूलानि अग्निमन्थस्तथैव च ॥ आलेपनमिदं चास्य कर्णमूलस्य नाशनम् ॥ १५७ ॥ बिजौराकी जड़, अरनी इनको पानीमें पीस लेप करना, यह लेप कर्णमूलको नाशता है ॥ अथ दूसरा लेप । आगारधूपरजनीसुमहौषधेन सिद्धार्थसैन्धववचापयसा विमर्द्य॥ लेपोहितो२रक्तविनाशकारी शोफव्रणस्य शमनो मनुजस्य कर्णे ॥ घरका धुआं ( श्रीवेष्टधूप ) हल्दी, सोंठ, सरसों, सेंधानमक, वच, इनको दूधसे १ "सन्निपातज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदारुणः। शोथःसञ्जायते तेन कश्चिदेव प्रमुच्यते" । इति माधवः । २ आस्मिँश्चरणे छन्दोभंगः ।