भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 229

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १९७ ) तथा शिरसि चातुरे॥ एवं नो शान्तिर्यदि वा दहेल्लोहशलाक- या ॥१४५॥ पादौ दग्धे न चेच्छैत्यं दहेद्वाऽङ्गुष्ठमूलके ॥ तथा च मणिबन्धे च हृदि मूर्ध्नि तथापि वा ॥१४६॥ स्वेदो ललाटे सुहिमो नरस्य शीतार्दितस्यापि सपिच्छलस्य ॥ कण्ठस्थितो यस्य न याति वक्षो नूनं समभ्येति गृहं हि मृत्योः ॥१४७॥ सप्ताहे वा दशाहे वा द्वादशाहेऽथवा पुनः ॥ त्रयोदशे पञ्चदशे प्रशमं याति हन्ति वा ॥ १४८ ॥ अथ पञ्चादशाहे वा हन्ति रक्षति मानवम् ॥ सन्निपातो महाघोरो ज्वरः कालाग्निसन्निभः ॥१४९॥ एषा त्रिदोषमर्यादा मोक्षाय च वधाय च॥सन्नि- पातस्य दोषस्य नरस्यास्य भिषग्वर॥ १५०॥सन्निपातेऽन्तर्दाहे मनुजं यः शीतवारिणा सिञ्चेत्॥ आतुरः कथमपि जीवेद्वैद्य- श्चासौ कथं पूज्यः॥१५१॥यःसन्निपातजलधौ पतितं मनुष्यं वैद्यः समुद्धरति किन्न कृतं नु तेन ॥ धर्मेण वाथ यशसा विनयेनयुक्तः पूजां च कां भुवितले न लभेत वैद्यः ॥१५२॥ जो शीतल शरीर हो तब पसीना देना चाहिये, अग्नि दूर करनेके कारणरूपी स्वेद अर्थात् पसीने तेरह जानने ॥ १४२ ॥ संकर, नाड़ीपारिषेक, अवगाहन, आर्तक, अस्मयन, कर्ष, कूटी, भूकुंभि ॥ १४३ ॥ कूप होलाका, कालस्वेद, घटीस्वेद, वालुकास्वेद ये तरह प्रकारके स्वेद मनुष्यके पसीनाको लाते हैं ॥ १४४ ॥ इनसे रोगीके हाथ, पैर, शिर इन्होंपै पसीनाको देवे । जो ऐसे शांति नहीं हो तब लोहाकी सलाईसे दाग देवे ॥ १४५ ॥ जो पैरपै दाग दियेसे भी शीतलता नहीं उपजे तब अँगूठाके मूलमें दग्ध करे अथवा मणिबन्ध अर्थात् पहुँचा, हृदय, मस्तक, इन्होंमें दग्ध करे ॥ १४६ ॥ जिसके मस्तकपै ठण्डा पसीना आवे और सब शरीर शीतल होवे, शीतसे पीड़ित और कफकी अधिकतावाला ऐसे मनुष्यके कण्ठ- तक पसीना आवे, छातीमें नहीं प्राप्त होवे वह मनुष्य निश्चय मृत्युको प्राप्त होता है ॥ १४७॥ सातमा अथवा दशमां अथवा बारमां,तेरमां पन्दरमां इन दिनोंमें सन्निपात ज्वर शांत हो जाता है अथवा रोगीको मार देता है॥ १४८ ॥ और पन्द्रहवें दिन निश्चय सन्निपातज्वर शांत होता है अथवा रोगीको मारता है । यह सन्निपातज्वर महाघोररूप है, काल और अग्निके समान कांतिवाला हैं ॥ १४९ ॥ सन्निपातकी शांत होनेकी अथवा मारनेकी यह मर्यादा है ॥ १५० ॥ सन्निपातमें जो शरीरमें दाह उपजे तब वैद्य शीतलपानीके छिड़के दिवाता है तब रोगी नहीं

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक) · पृष्ठ 229, कुल 548 में से · BharatKosha