भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 244

( २१२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- तब सुखको प्राप्त होता है ॥ २४९ ॥ इति बेरीनिवासिवुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनु- वादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने ज्वरचिकित्सानाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ तृतीयोऽध्यायः ३. अथातिसारचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अथातीसारविज्ञानं भेषजं शृणु पुत्रक ॥ ज्वरजो वातिसारश्च भेषजं चोपदिष्यते॥१॥ दोषसंशमनं कि- ञ्चित् किञ्चिच्च धातुदूषणम्॥स्वस्थवृत्तौ मतं किञ्चिद्द्रव्यंत्रिविध- मुच्यते ॥ २ ॥तच्च दैवपथाश्रयं युक्तिपथाश्रयं सत्त्वावजयञ्च॥ मन्त्रौषधमणिमंगलबल्युपहारहोमनियमप्रायश्चित्तोपवासस्व-- स्त्ययनप्रणिधानादीति दैवपथाश्रयम् ॥ आहारव्यवहारौषधद्र- व्याणां योजनेति युक्तिपथाश्रयम् ॥ अहितेभ्योऽर्थेभ्यो मनो- निग्रह इति सत्त्वावजयञ्च ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--हे पुत्र! अतीसारविज्ञान और औषधको सुन--ज्वरातिसार हो अथवा अतीसार हो तहां औषधका उपदेश कियाजाता है ॥ १ ॥ दोषको शमन करनेवाला कोई औषध है और धातुको दूषित करनेवाला कोई औषध है और स्वस्थवृत्तिमं कोई औषध माना है ऐसे औषध तीन प्रकारके हैं ॥ २ ॥ दैवपथाश्रय, युक्तिपथाश्रय, सत्त्वावजय ऐसे औषध तीन प्रकारके हैं। मन्त्र, औषध, मणि, मंगल, वलि, भेट, होम, नियम, प्रायश्चित्त, व्रत, स्वस्त्ययन, प्रणिधान आदि दैवपथाश्रय अर्थात् देवके मार्गसे आश्रित हुआ औषध कहाता है. आहार, व्यवहार, औषध इन्होंकी योजना की जावे वह युक्तिपथाश्रय अर्थात् युक्तिके मार्गसे आश्रित हुआ ओषध कहाता है. अहित अर्थोंसे मनका निग्रह होना यह सत्त्वावजय ओषध कहाता है ॥ ३ ॥ अथ अतिसारका लक्षण । स्निग्धातिशीतगुरूशीतलपिच्छलान्नं दुष्टाशनातिविषमाशनपा- नभक्ष्यम्।अद्यादजीर्णमथ शोकविषैर्भयैर्वा शोकार्त्तिदुष्टपयसा तु विपर्य्ययेषु ॥४॥ दौर्बल्यतां विषमभोजनकेन चाप्सु संभि- द्यते मलमजीर्णं निहन्ति चाग्निः॥सञ्जायते हि मनुजस्य तदा- तिसारो हत्वोदरानिं मनुजस्य तदातिसारः ॥ ५ ॥ सञ्जायते