हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( २१३ ) स तु पुनर्बहलो मलेन स्यात्पञ्चधा निगदितो मुनिभिर्विधिज्ञैः॥ रक्ष्ये समासत उदीर्णरुजस्य नाशः क्वाथादिकैर्भवति पाचनकैश्च पूर्वम् ॥ ६ ॥ चिकना, अत्यन्त शीतल, भारी, शीतल, कफकारी, दुष्ट ऐसे भोजन और अत्यन्त भोजन, विषम भोजन और विषमपान और अजीर्णमें भोजन इन्होंने और शोक, विष, भय इन्होंने और शोककारिके दुष्ट हुए दूधसे अथवा शयनादिके विपरीतपनेसे ॥४॥ दुर्बल मनुष्यका विषम भोजन- से अपक्व मल जलमें फैलकर अग्निको शांत कर देता है उसी समय मनुष्यके अतीसार होता है ५॥ वह मलसे अत्यंत बढ़ा होता है और विधिको जाननेवाले मुनियोंने वह पांच प्रकारका कहा है । बढ़े हुए रोगके नाशको प्रथम क्वाथ आदि और पाचनकरके रक्षित करना ॥ ६ ॥ अथ ज्वरातिसार । युगपज्जायते यस्य ज्वरश्चैवातिसारकैः॥ज्वरातिसारो घोरोऽसौ कष्टसाध्यो मनीषिणाम् ॥ ७॥ न पित्तेन विना सोऽपि जायते शृणु पुत्रक ॥ तस्य नो लंघनं प्रोक्तं ज्वरे चैवातिसारके ॥८॥ जिस रोगीके एककालमें ज्वर और अतीसार उपजे वह घोररूप ज्वरातिसार कहाता है। यह बुद्धिमानोंको भी कष्टसाध्य है ॥७ ॥ हे पुत्र ! सुन पित्तके बिना ज्वरातिसार नहीं होता है इसवा- त ज्वरातिसारमें लंघन नहीं कहा है ॥ ८ ॥ अथ अतीसारकी चिकित्सा । सुवर्चलमतिविषांहिंगुपथ्याकलिङ्गकैः ॥ शुण्ठी वामातिसारघ्नी शूलघ्नी ग्राहिपाचनी ॥९॥पथ्यादारुवचामुस्तानागरातिविषा- युतैः॥ आमातिसारनाशाय क्वाथमेभिः पिबेन्नरः ॥ १० ॥ काला नमक, अतीस, हींग, हरड़ै, इंद्रजव, सोंठ इन्होंकी गोली आमातीसार, शूल, इनको नाशती है पाचन है और कब्जको करती है ॥ ९ ॥ हरड़े, देवदार, वच, नागरमोथा, सोंठ, अतीस इन्होंका क्वाथ आमातीसारको नाशता है ॥ १० ॥ अथ ज्वरातिसारके ऊपर उत्पलषङ्क । उत्पलं धान्यकं शुण्ठी पृश्निपर्णी बलायुतम्॥बालबिल्वं गवां तक्रेणात्युष्णेन च पेषयेत् ॥११ ॥ तेन लाजाकृतं मण्डं देय- मानीय शीतलम्॥ ज्वरातिसारशमनं हुताशनबलप्रदम् ॥१२॥ नीला कमल, धनियां, सोंठ, पिठवन, खरैहंटी, बेलगिरीका गूदा इनको गायके तक्रसे पीसे Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu