भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १९५ ) अथ सन्निपातस्वेदहर । वचा यवानी च महौषधञ्च शुष्कञ्च चूर्णं तनुलेपनाय ॥ शस्तं वदन्ति ज्वरघर्मशान्तिं करोति नूनं परिमर्द्दनञ्च ॥ १३० ॥ मागधी च सुरदारु तथा च विश्वकं तिक्ता च दीप्यकयुतं तनुलेपनाय ॥ चूर्णं प्रशस्तमपि वारयते शरीरे स्वेदञ्च शीतलतनुर्भवेदाशु नूनम् ॥ १३१ ॥ वच, अजमान, सोंठ इनका सूखा चूर्ण बना शरीरपै मालिस करे । यह ज्वरको और पसी- नाको शांत करता है ॥ १३० ॥ पीपल, देवदारु, सोंठ, कुटकी, अजमान इनका चूर्ण बना शरीरपै मालिस करनेसे पसीने दूर होते हैं और शरीर शीतल होजाता है ॥ १३१ ॥ अथ नस्यविधान । मधूकसारं समहौषधेन वचोषणा सैन्धवसंयुता च ॥ मूत्रेण वा चोष्णजलेन पिष्टं प्रनष्टज्ञानप्रतिबोधनाय ॥ १३२ ॥ शोभाञ्जनमूलस्य रसं समरिचान्वितम्॥विसंगितानां नस्यं स्याद्बोधनं चाशु रोगिणाम् ॥१३३ ॥ महुआका सार, सोंठ, बच, मिर्च, सैंधानमक इनको गोमूत्रमें अथवा गरमपानीमें पीस नाकमें चढावे, यह नस्य मूर्च्छाको प्राप्तहुएको जगाता है ॥ १३२ ॥ सहिंजनाकी जड़के रसमें मिरचोंका चूर्ण मिला नासिका में चढ़ानेसे संज्ञासे रहित मनुष्योंको शीघ्र ज्ञान होजाता है ॥ १३३ ॥ अथ प्रधमनविधि । एकं बृहत्याः फलपिप्पलीकं शुण्ठीयुतं चूर्णमिदं प्रशस्तम् ॥ प्रधामयेद्घ्राणपुटे तु संज्ञाचेष्टां करोति क्षवथुप्रबोधः॥ १३४॥ बडी कटेलीका एक फल, पीपल, सोंठ इनका चूर्ण बना पुटलीके द्वारा नासिका में चढानेसे छींक आती है और चेष्टा होजाती है ॥ १३४ ॥ अथ अंजनविधि । शिरीषबीजं मरिचोपकुल्यामूत्रेण घृष्टं सह सैन्धवेन ॥नेत्राञ्जनं स्यान्नयने नराणां प्रनष्टसंज्ञां प्रकरोति बोधः ॥ १३५ ॥ त्रिकटु तथा च करञ्जबीजं त्रिफला सुरदारु सैन्धवम्॥ तुलसी वर्तिर्नयनाञ्जनकं तन्द्रानाशं करोति नयनानाम् ॥ १३६ ॥