भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 226

( १९४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने द्विपञ्चकगणैर्युक्तः क्वाथो हितः ॥ पीतः सर्वरुजां विनाशन- करः स्यात्सन्निपातज्वरं हन्ति श्वासविशोषवक्षसिरुजं तन्द्रां जघान द्रुतम् ॥१२५ ॥ चिरायता, देवदारु, सोंठ, नागरमोथा, कुटकी, इन्द्रयव, गजपीपल, दशमूल इन सात चीजोंके क्वाथ बना पीना । यह सब प्रकारके रोगोंको और सन्निपातज्वरको नाशता है और श्वासरोग, शोषरोग, छातीकी पीड़ा, तंद्रा इनको शीघ्र नाशता है ॥ १२५ ॥ अथ बृहद्रास्नादि क्वाथ । रास्त्रा गुडूचीघनपर्पटकं पटोली भूनिम्बवत्सकशटीयुतनागराणा- म् ॥ तिक्तासुराह्वगजमागधिकायवासावासाबलागजबलाक्वथितः समांशः॥ १२६॥ क्वाथो निहन्ति मरुतप्रभवामयानां सश्वास- कासजठरार्तिविषूचिकानाम्॥ श्रेष्ठो नृणां भुवि च पाचनसन्नि- पाते रोगेऽथवा कफसमीरणके प्रदेयः ॥ १२७ ॥ रायसन, गिलोय, नागरमोथा, पित्तपापड़ा, परंवल, चिरायता, इन्द्रयव, कचूर, सोंठ, कुटकी, देवदारु, गजपीपल, जवासा, वांसा, खरैहटी, बड़ी खरैहटी ये सब समानभाग ले क्वाथ बनावे ॥ १२६ ॥ यह क्वाथ वातसे उपजे रोग, श्वासरोग, खांसी, पेटरोग, विषूचिका, इनको नाशता है। यह पाचन मनुष्योंको संसारमें श्रेष्ठ है अथवा कफवातके रोगमें देना चाहिये ॥ १२७ ॥ अथ लघुरास्नादि । रास्त्रात्रिकण्टकघनाशतमोषधीनां भार्ङ्गी सपुष्करयुता सुर- दारुधान्याः ॥ क्वाथो हितः सकलमारुतजिज्ज्वरेषु स्यात्स- न्निपातप्रभवेष्वतिदारुणेषु ॥ १२८ ॥ रायसन, गोखरू, नागरमोथा, शतावरी, भारंगी, पोहकरमूल, देवदारु, धनियां इनका क्वाथ दारुण सन्निपातज्वरोंमें हित है और वायुसे उत्पन्न रोगोंको जीतता है ॥ १२८ ॥ अथ त्रिवृतादि मलभेदन । त्रिवृद्विशाला च तथा सुराह्वमारग्वधस्तिक्तकरोहिणी च ॥ क्वाथोभवेद्भेदनको मलानां स्याद्वातशूले नयतो भयघ्नः॥१२९॥ निसोध, इन्द्रायणकी जड़, देवदारु, अमलतास, कुटकी इनका क्वाथ मलको पतला करता है और वातशूलको करता है ॥ १२९ ॥