भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १८९ ) अथ पटोलादि क्वाथ। पटोली चन्दनं तिक्ता मूर्वा पाठामृतौगणः १॥ पित्तश्लेष्मज्वरच्छर्द्दिदाहकण्डूनिवारणः ॥९७॥ परवल, रक्तचंदन, कुटकी, मरोडफली, पाठा, गिलोय आदि गणके औषध, इन्होंका क्वाथ पित्तकफज्वर, छर्दि, दाह, खाज इनको दूर करता है ॥ ९७ ॥ अथ अन्यपटोलादि क्वाथ । पटोलवासापिचुमन्दकस्य मूलानि यष्टीमधुकं धना च ॥ कषा- यमेतत्प्रतिसाधितन्तु ज्वरे कफे पित्तभवे प्रशस्तः ॥ ९८ ॥ सन्दीपनो पित्तकफात्मके च तथैव पित्तासृजसंभवे च॥ ज्वरे मलानां प्रतिभेदनः स्यात्पटोलधान्याश्रितकः प्रशस्तः ॥९९॥ परवल, वांसा, नीमकी छाल, मुलहटी, धनियां इनका क्वाथ पित्तकफज्वरमें श्रेष्ठ है ॥९८॥ यह क्वाथ अग्निको जगाता है, पित्त कफज्वरमें हित है, पित्तरक्तके ज्वरमें हित है और मलोंको पतला करता है तथा परवल और धनियांका भी क्वाथ इन रोगोंमें ठीक है ॥ ९९ ॥ अथ वातकफज्वरका निदान और चिकित्सा । शीतं वेपथुपर्वभङ्गवमथुर्गात्रे जडत्वं चरुङ्मन्दोष्मारुचिबन्धनं परुषता कासस्तमःशूलवान् ॥ तन्द्रा कूजनमात्मलौल्यमथवा स्तैमित्यजृम्भारुचिःप्रस्वेदोमलमूत्ररोधसहितः स्याच्छ्लेष्मवात- ज्वरः ॥ १०० ॥ शीत लगे और शरीर कांपे और संधियें टूटें, वमन हो और शरीरमें जडपना, शूल, मंदाग्नि, अरुचि, बंधना, कठोरपना, खाँसी, अन्धकारमें जैसे प्रवेश करनेका कष्ट ये उपजैं, तंद्रा हो, शब्दको करे और शरीरमें चंचलपनाहो और शरीरका गीलापन, जंभाई, अरुचि, ये उपजैं और पसीना आवे मल और मूत्र रुकजावे ये सब लक्षण होवें तब वातकफज्वर जानना ॥ १०० ॥ अथ आरग्वधपंचक । आरग्वधस्तिक्तकरोहिणी च हरीतकी पिप्पलिमूलमुस्ता ॥ निष्क्वाथ्य कल्कः कफवातयुक्ते ज्वरे सशूले हितपाचनोऽयम् १०१ आरग्वध, कुटकी, हरडा, पीपलामूल, नागरमोथा, इनका क्वाथ करके कल्क करे, यह कल्क कफवातमें उत्पन्न शूलकरिके युक्त ज्वरमें हितकारक और पाचन है ॥ १०१ ॥ १ हर्र, गिलोय, नागरमोथा, चित्रा, चिरायता, हल्दी, इन्द्रजौ, सोंठि ।