हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १८५ ) वासो मुक्ताहारो विशदतुहिनं कौमुदी वा सुखाय ॥७५॥ एत घ्नन्ति द्रुततरनिभं मानुषाणां तु पित्तं दाहं शोषं क्लममपि तथा तृड्भ्रमं मूर्च्छनाञ्च॥एतद्योगं भवति नितरां पित्तदाहस्य शान्ति- योग्या चैवं भवति सततं तत्क्रिया श्रीमताञ्च ॥ ७६ ॥ सुंदर और रमणीक चूचियोंके भारसे नम्रहुई स्त्रीका आलिंगन करे परंतु मथुनको नहीं करे और दाखके रस सेवन करे, शीतलपदार्थको सेवता रहे सफेद कमल और मलयागिरि चदनके पानीसे भिगोयाहुआ शीतलवस्त्रको धारे और मोतियोंकी मालाको पहने और सुंदर शीतल हवा और चांदनी ये सब पित्तज्वरको सुख देते हैं ॥ ७५ ॥ यह सब मनुष्योंके पित्त, दाह, शोष, ग्लानि, तृषा, भ्रम और मूर्च्छाको शांत करते हैं और इन योगोंसे पित्तका दाह दूर होजाता है, धनवान् मनुष्योंके वास्ते यह क्रिया निरंतर योग्य है ॥ ७६ ॥ अथ ज्वरशोषका उपाय । यदि जिह्वागलतालुशोषश्चेन्मनुजस्य च ॥ केसरं मातुलुङ्गस्य मधुसैन्धवसंयुक्तम् ॥ पेष्यमाणं तालुलेपे सद्यः पित्तज्व- रापहम् ॥ ७७ ॥ और जो मनुष्यके जीभ, गल, तालु इनमें शोष उपजे तो बिजौराका केसर ले उसमें शहद और सैंधानमक मिला पीसकर तालुपे लेप करें यह शीघ्र पित्तज्वरको नाशता है ॥७७॥ अथ कफज्वरका निदान और चिकित्सा । स्तैमित्यं मधुरास्यता च जडता तन्द्रा भृशं स्यात्तथा गात्राणां गुरुतारुचिर्विरसता रोमोद्गमः शीतता ॥ प्रस्वेदाः श्रुतिरोधनञ्च भवते नेत्रे च पाण्डुच्छवी विष्टब्धं मलमूत्रिकासवमनं श्लेष्म- ज्वरे ज्ञायताम् ॥ ७८ ॥ शरीरका गीलापन हो, मुख मीठा रहे, जडपना,अत्यंत तंद्रा हो, शरीरका भारीपन, अरुचि, ग्लानि, रोमोंका खडा होना, शीतलपना ये उपजे और पसीना आवे और कानोंका छिद्र रुक जावे और आधा पीला और आधा सफेद ऐसे वर्णकी कांतिसे संयुक्त नेत्र होजावें मलकी प्रवृत्ति बँधी हो, खांसी और छर्दि आवे ये सब लक्षण हों तब कफज्वर जानना ॥ ७८ ॥ अथ कफज्वरका पाचन पिप्पल्यादिकल्क । पिप्पलादिककल्कं तु कफजे पाचनं हितम् ॥ ७९ ॥ १ “पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः । वचासातिविषाजाजीपाठावत्सकरेणुकैः १ किराततिक्तरुकंमूवा सर्षपा मरिचानि च । कटुकं पुष्करं भार्ङ्गी विडङ्गं कर्कटाह्वयम् २ अर्कमूलं बृहत्सिंही श्रेयसी सुदुरालभा।दीपक चाजमोदाच शुकनासाद्धिहङ्गुभिः ३ एतानि समभागानि गणोऽष्टाविंशको मतः। कषायमुपभुञ्जीत वातश्लेष्मज्व- रापहम् ४ हन्ति वातं तथा शीतं स्वेदजं प्रवलं कफम्।प्रलापंचातितन्द्रां च रोमहार्च्चितथा ५ महावातेऽपत- मन्त्रे च सर्वगात्रेच शून्यताम् । अयं सर्वज्वरान् हन्ति सन्निपातांस्त्रयोदशति ॥ ६ ॥” इति शार्ङ्गधरे ।