हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अकेला पित्तपापडाका क्वाथ भी पित्तज्वरको शांत करनेके लिये योग्य और अति उत्तम है फिर सोंठ और नेत्रवालासे युक्तकिये पित्तपापडाका क्वाथ पित्तज्वरको ऐसे नाशता है जैसे हाँसके भिंडेमें प्राप्तहुआ सिंह वनके पशुको नाशता है ॥ ६९ ॥ अथ शुंठादि क्वाथ । नागरोशीरमुस्ता च चन्दनं कटुरोहिणी ॥ धान्यकानां तु क्वाथश्च पित्तज्वरविनाशनः ॥ ७० ॥ सोंठ, खस, नागरमोथा, रक्तचंदन, कुंटकी, धनियां इनका क्वाथ पित्तज्वरको ना- शता है ॥ ७० ॥ अथ गुडूच्यादि क्वाथ । अमृतं पर्पटो धात्री क्वाथः पित्तज्वरं हरेत् ॥७१ ॥ गिलोय, पित्तपापडा, आंवला, इनका क्वाथ पित्तज्वरको नाशता है ॥ ७१ ॥ अथ द्राक्षादि क्वाथ । द्राक्षापर्पटिकातिक्तापथ्यारग्वधमुस्तकैः ॥ क्वाथो भ्रमस्तृषादाहयुक्तपित्तज्वरापहः ॥ ७२ ॥ दाख, पित्तपापडा, कुटकी, हरड़, अमलतास, नागरमोथा, इनका क्वाथ तृषा, भ्रम, दाह इनसे युक्तहुए पित्तज्वरको नाशता है ॥ ७२ ॥ अथ दाहतृषामूर्च्छाके ऊपर विदार्यादिकोंका उपचार । विदारिकारोध्रकपित्थकानां स्यान्मातुलुङ्गस्य च दाडिमानाम्॥ यथानुलाभेन च तालुलेपो दाहं तृषामूर्च्छनमाशु हन्ति ॥७३॥ विदारीकंद, लोध, कैथ, बिजौरा, अनार, इनमेंसे जितने मिलें उनका लेप बनाकर तालुके ऊपर लगावे यह दाह, तृषा, मूर्च्छा, इनको नाशता है ॥ ७३ ॥ अथ दाहज्वरका उपाय । उत्तानस्य प्रसुप्तस्य कांस्ये वा ताम्रभाजने ॥ नाभौ निधाय धारां तु शीतां दाहं निवारयेत् ॥ ७४ ॥ रोगीको सीधा शयन कराके तिसकी नाभीपर कांसीके अथवा तांबाके पात्रमें पानीकी धारा देनी यह दाहको नाशती है ॥ ७४ ॥ रम्यरामाकुचभरनतालिङ्गनं चेष्टसङ्गाद्राक्षापानं निगदितमथो शीतलं सेवनं स्यात् ॥ शुभ्राम्भोजं मलयजजलासिक्तसंशीत-