हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २] भाषाटीकासमेता । ( १८३ ) मूर्च्छा और दाह उपजे, भ्रम,मद, तृषा ये भी होवें और ज्वरका तीक्ष्ण वेग हो अतीसार हो तंद्रा और आलस्य हो और बकवाद करे और छर्दि आवे और मुखमें पाक और दाह हो,पसीना और श्वास उपजे मुख कडुआ हो जावे विह्वलपना और भूख भी होवे, ये सब लक्षण होवें तब पित्तज्वर जानना ॥ ६४ ॥ अथ रोध्रादि क्वाथ । रोध्रोत्पलामृतलताकमलं सिताढ्यं तत्सारिवासहितमेव हि पाच- नेषु॥निष्क्वाथ्य क्वाथमति चाशु निहन्ति पित्तं पित्तज्वरप्रश- मनं प्रकरोति पुंसाम् ॥ ६५ ॥ लोध, नीलाकमल, गिलोय, श्वेतकमल, सफेद भटकटैया, सारिवा इन्होंका पाचन क्वाथ बना तिसमें मिश्री डाल पीवे यह पित्तको शीघ्र शांत करता है और मनुष्योंके पित्तज्वरको भी नाशता है ॥ ६५ ॥ अथ शक्राह्वादि क्वाथ । क्वथितं तण्डुलपयसा शक्राह्वं कटुरोहिणीसहितम् ॥ क्वाथं यष्टीमधुना विनाशनं पित्तज्वराणाम्तु ॥ ६६ ॥ इन्द्रयव, कुटकी, मुलहटी इनका क्वाथ चावलोंके पानीमें बनाकर मधुके साथ पीवे यह पित्त- ज्वरको नाशता है ॥ ६६ ॥ दुरालभादि क्वाथ । दुरालभावासकपर्पटानां प्रियङ्गुनिम्बोत्कटुरोहिणीनाम्॥किरात- तिक्तं क्वथितं कषायं सशर्कराढ्यं क्वथितञ्च पाचनम् ॥ ६७ ॥ सदाहपित्तज्वरमाशु हन्ति तृष्णाभ्रमं शोषविकारयुक्तम् ॥६८॥ जवासा, वासा, पित्तपापडा, प्रियंगु, नींवकी छाल, कटुकी, चिरायता, इन्होंका क्वाथ बना खांडसे संयुक्तकर पीवे पाचन है ॥ ६७ ॥ यह दाह, पित्तज्वर, तृषा, भ्रम, शोषरोग, इनको नाशता है ॥ ६८ ॥ अथ पित्तपापडाका क्वाथ । एकोऽपि वै पर्पटको वरिष्ठः पित्तज्वराणां शमनाय योग्यः ॥ तस्मात्पुनर्नागरवालकान्यैः सिंहो यथा कङ्कटकप्रवृत्तः॥६९॥ १-प्रियंगु गोंदींके समान फल है जिसे मालवेमें गेहुला कहते हैं इसमें सुगंधी भी होती है, यह गंध प्रियंगु है और प्रियंगु गोंदी फल ही समझिये । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu