भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 214

( १८२ ) हारीतसंहिता ! [ तृतीयस्थाने- दाह हो, अंग शिथिल हो जावे, मूर्च्छा, शिरमें शूल, ग्लानि, दीनपना ये उपजे, भ्रम हो और विशेष करके अरति हो ये लक्षण कुछ कमपकी औषधके हैं ॥ ५८ ॥ इसकारणसे औष- धिके शेषमें कहीं भी दोषका शमन नहीं है क्योंकि पाचनके विना दोष अनेक प्रकारसे कुपित होते हैं ॥ ५९ ॥ अथ भोजनके उपरांत देनेके औषधके गुण । शीघ्रं विपाकमुपयाति बलं न हन्यादन्नावृतं न च मुहुर्वदनान्निरे- ति ॥ प्राग्भुक्तसेवितमहौषधमेतदेव दद्याच्च वृद्धशिशुभीरुवराङ्ग- नाभ्यः ॥ ६० ॥ अन्नसे आवृत हुआ औषध शीघ्र पकजाता है और बलको नाशता नहीं है और वारंवार मुखसे नहीं निकलता है इसलिये प्रभातके भोजनके साथ सेवित किया औषध-वृद्ध, बालक, डर- पोंक और स्त्री इनको सुख देता है ॥ ६० ॥ अथ वातज्वरमें पंचमूलका क्वाथ । बिल्वाग्निमन्थशुकनासकपाटलीनां कुम्भारिकाप्रयुतकं क्वथितं कषायम् ॥ दन्तान्विशोधयति वारयते समीरं नाशं करोति मरुतज्वरमाशु पुंसाम् ॥ ६१ ॥ मुस्ताकिरातसुरवल्लिकणास- वित्र्यो गोकण्टको बृहतियुग्ममुदीच्यतिक्ताः॥स्याच्छाखिपर्णि- कलशीक्वथितः समन्तात्क्वाथः समीरणभवं ज्वरमाशु हन्ति ॥ ६२ ॥ गुडूची शतपुष्पा च पृक्षी रास्ना पुनर्नवा ॥ त्राय- माणकक्वाथश्च गुडैर्वातज्वरापहः ॥ ६३ ॥ बेलगिरी, अरनी, सोनापाठा, पाडल, कोहला, कुंभेरन इनका क्वाथ बना पीवे यह दन्तोंको शोधता है और वातको दूर करता है मनुष्योंके वातज्वरको शीघ्र नाशता है ॥ ६१ ॥ चिरा- यता, नागरमोथा, गिलोय, पीपल, लालआक, गोखरू, दोनोंकटेली, नेत्रवाला, कुटकी, पिठ- वन, चौलाई, इन्होंका क्वाथ वातज्वरको अच्छीतरह नाशता है ॥ ६२ ॥ गिलोय, सौंफ, पिठवन, रायसन, सांठी, त्रायमाण इनके क्वाथमें गुड़मिलाकर पीवे यह वातज्वरको हरता है ॥ ६३ ॥ अथ पित्तज्वरके निदान और चिकित्सा । मूर्च्छादाहो भ्रममदतृषावेगतीक्ष्णोऽतिसारस्तन्द्रालस्यं प्रलपन- वमीपाकतापश्च वक्त्रे ॥ स्वेदः श्वासो भवति कटुकं विह्वलत्वं क्षुधा वा एतैर्लिङ्गैर्भवति मनुजे पैत्तिको वै ज्वरस्तु ॥ ६४ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu