हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १८१ ) धान रहे और भयकी इच्छा करे और भयभीतकी तरह सोवे परन्तु जागता ही रहे ये लक्षण वातज्वरके हैं ॥ ५३ ॥ अथ वातज्वरका पाचन । नागरं सुरतरुश्च धान्यकं कुण्डली बृहत्तिकायुग निशम् ॥ सप्तमे निशि प्रशस्यते ज्वरे चाष्टमांशगतको हि अष्टवान्॥५४॥ सोंठ, देवदारु, धनियां, गिलोय, दोनों कटेली, हल्दी, दारुहल्दी इन आठ औषधोंकी अष्टमावशेष पाचन संज्ञक काथ बना ज्वरमें सातवीं रात्रीको देना ॥ ५४॥ यह शुंठ्यादि पाचन सब प्रकारके ज्वरोंमें देना चाहिये ॥ अथ अन्नहीन औषधका गुण । वीर्याधिकं भवति भेषजमन्नहीनं हन्यात्तदामयमसंशयमाशु चैव ॥ तद्वालवृद्धयुवतीमृदुभिश्च पीतंग्लानिं परां नयति चाशु बलक्षयं च ॥ ५५ ॥ अन्नसे हीन हुआ औषध अधिक वीर्यवाला हो जाता है और रोगको निश्चय शीघ्र नाशता है ॥ परन्तु बालक, वृद्ध, युवतीस्त्री, कोमल, इनकरके पिया हुआ वह अन्नरहित औषध परम- ग्लानिको और बलक्षयको करता है ॥ ५५ ॥ अथ पाचन हुए औषधका लक्षण । इन्द्रियाणां लघुत्वञ्च नेत्रास्यस्य प्रसादता ॥ सोद्गारमुष्णता कोष्ठे जीर्णभेषजलक्षणम् ॥ ५६ ॥ इंद्रियोंका हलकापन हो नेत्र और मुखकी प्रसन्नता रहे , डकार आवे, कोष्ठमें गर्माई रहे ये पके हुए औषधके लक्षण हैं ॥ ५६ ॥ अथ अपक्व औषधका गुण । क्लमहृल्लाससदनं शिरोरुग्भ्रंशमेव च उत्क्लेदो जायते यस्य विद्यादुत्क्राममौषधम् ॥ ५७ ॥ ग्लानि और थुकथुकी हो, शरीर शिथिल हो जावे, शिरमें शूल और फूटन उपजे और वम नसा आनेकी तरह होवे ये नहीं जीर्ण हुए औषधके लक्षण हैं ॥ ५७ ॥ अथ पाचन होनेमें कुछ शेषरहे औषधका लक्षण । दाहाङ्गसदनं मूर्च्छा शिरोरुक्क्लसदीनता ॥ भ्रमोऽरतिविशेषेण सविशेषौषधाकृतिः ॥ ५८ ॥ तस्मादौषधशेषे तु न दोषशमनं क्वचित् ॥ कुप्यन्त्यनेकधा दोषा न देयं पाचनं विना ॥५९॥ १ सर्वज्वरेषु नागरादिपाचनं देयम् । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu