हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'अ० २] भाषाटीकासमेता । ( १८७ ) नयने रक्तता कण्ठशोषः॥निद्रानाशः श्वसनशिरसो रुकप्रभे- दोऽङ्गभङ्गो रोमोद्धर्षस्तमकमितिचेद्वातपित्तज्वरःस्यात् ॥८५॥ तृषा, मूर्च्छा, छर्दि, ये उपजें और मुखमें कडुआपन हो और शरीर रूखा होजावे, शरीर- के भीतर दाह हो और लालनेत्र होजावें और कंठमें शोष होवे और नींदका नाश हो, श्वास और शिरमें शूल और फूटनहो और अँगडाइ टूटे रोमावली खडी हो, और अँघेरी आवे ये सब लक्षण हों तब वातपित्तज्वर जानना ॥ ८५ ॥ अथ वातपित्तज्वरका पाचन त्रिफलाद क्वाथ। संसृष्टदोषैर्विहितञ्च सम्यग्विपाचनं पित्तमरुज्ज्वरे च ॥ फलत्रिकं शाल्मलिसंप्रयुक्तं रास्नाकिरातस्य पिवेत्कषायम्॥८६॥ मिलेहुए दोषोंसे युक्त ज्वरमें योग्य पाचनको वातपित्तज्वरमें देवे और हरडे, बहेडा, आंवला, शमलकी छाल, रायसन, चिरायता, इनके क्वाथको पीवे ॥ ८६ ॥ अथ शालिपर्ण्यादिकल्क । द्विपञ्चमूली सह नागरेण गुडूचिभूनिम्बनघनैः समेतः ॥ कल्कः प्रशस्तः सगुडो मरुत्सु स पित्तवातज्वरनाशहेतुः॥८७॥ दशमूल, सोंठ, गिलोय, चिरायता, नागरमोथा इनके कल्कमें गुड़ मिला खावे, यह वात- पित्तज्वरको नाशता है और वातसे उत्पन्न होनेवाले रोगोंमें हित है ॥ ८७ ॥ अथ किरातादि क्वाथ । किराततिक्तामलकीशटीनां द्राक्षोषणानागरकामृतानाम् ॥ क्वाथः सुशीतो गुडसंयुक्तः स्यात्स पित्तवातज्वरनाशहेतुः॥८८॥ चिरायता, कुटकी, आंवला, कचूर, मुनक्का, दाख, मिर्च, सोंठ, गिलोय, इनका क्वाथ गुड़ मिलाकर ठंडा पीवे यह वातपित्तज्वरको नाशता है ॥ ८८ ॥ अथ पंचभद्रक्वाथ । अमृतमुस्त कवासापर्पटविश्वाजलेन क्वाथः ॥ पानं पित्तमरुत्सु ज्वरं निहन्याच्च भद्रपुञ्जः ॥८९ ॥ गिलोय, नागरमोथा, वांसा, पित्तपापडा, सोंठ इनका पानीमें क्वाथ बनावे, यह पंचभद्र- क्वाथ वातपित्तज्वरको नाशता है ॥ ८९ ॥ अथ पित्तकफज्वरका निदान और चिकित्सा । निद्रागौरवकात्ससन्धिशिरोरुक्चार्तिस्तथा पर्वणां भेदो मध्य- मवेगमत्र नयनेवातान्विते श्लेष्मणि॥सन्तापः श्वसनं रुचिःश्रु-
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