हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- शरीरके अंग अत्यंत चिकने हो जावे और पेट अत्यन्त बोले, शिरमें पीड़ा हो और पेटपै अफारा उपजे और निरंतर कंठ जलता और बोलता रहे ॥३२॥ और अरुचि हो,नेत्रोंमें पीला- पन उपजे,नींद और तंद्रासे रोगी पीडित होवे ये आमज्वरके लक्षण हैं । इस रोगवालेको कुशल वैद्य लंघन करवावे ॥ ३३ ॥ अथ छःप्रकारके लंघन । अनशनवमनविरेचनरक्तस्रुतिंतप्ततोयपानैः ॥ स्वेदनकर्मसहितैः षड्विधं लंघनं गदितम् ॥ ३४ ॥ नहीं खाना,वमन,जुलाब,रक्तका निकालना,गरम पानीको पीना,स्वेद अर्थात् पसीनाका देना इन भेदोंसे लंघन छः प्रकारका कहा है ॥ ३४ ॥ अथ विरतज्वरलक्षण । क्षुत्क्षामं श्रमशैथिल्यं भ्रमवेगज्वरातुरम् ॥ अन्तर्दाहं रक्तमूत्रं विरामज्वरलक्षणम् ॥ ३५ ॥ भूख थोड़ी लगे हलकापन हो,श्रमसे शिथिलपना हो और भ्रम,वेग, ज्वर इनसे रोगी पीड़ि- त होवे और शरीरके भीतर दाह रहे और लाल मूत्र उतरे ये विरामज्वरके लक्षण हैं अर्थात् ये लक्षण उपजें तब जानना कि, ज्वर उतरनेवाला है ॥ ३५ ॥ अथ दोषपरत्वसे लंघनकी मर्यादा । वातिको लंघनैः षड्भिः पैत्तिकस्तु दिनत्रयम् ॥ सप्तभिःपचते श्लेष्मा दृष्ट्वा लंघनमाचरेत् ॥ ३६ ॥ त्रिदोषो दशरात्राणि पचते लंघनैस्तु सः ॥ दिने पञ्चदशे प्राप्ते पचते सान्निपातिकः ॥३७॥ मुञ्चेद्वा आतुरं हन्ति भवेद्वा विषमज्वरः ॥ वातदोष छः लंघनोंसे पकता है,पित्तदोष तीन दिनमें पकता है,कफदोष सात लंघनोंसे पकता है ऐसे देखके लंघनका आचरण करे ॥ ३६ ॥ त्रिदोष लंघनोंसे दशदिनकरके पकता है और पंद्रहदिनोंकरके सन्निपातदोष पकता है ॥ ३७ ॥ इनकालोंमें ये दोष रोगीको छोड़ देते हैं अथवा मारते हैं,किंवा विषमज्वरको उपजाते हैं ॥ अथ वयपरत्वसे दोषोंके कोपका प्रकार । बाल्ये रक्तमया दोषाः कफपित्तादनंतरम् ॥ ३८ ॥ षोडशे तु समे प्राप्ते त्रिदोषप्रभवा गदाः ॥ पञ्चविंशतिमे प्राप्ते ज्वरो वै सान्निपातिकः ॥ ३९ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu