भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १६७ ) मनुष्यकी बालकअवस्थामें रक्तकी प्रधानतावाले दोष रहते हैं, पीछे कफ और पित्तकी अधिकतावाले दोष हो जाते हैं ॥ ३८ ॥ सोलहवां वर्ष प्राप्त होते ही त्रिदोषसे रोग उपजते हैं और विशेषकरके पचीस वर्षतक सन्निपातसे ज्वररोग उपजता है ॥ ३९ ॥ अथ ज्वरवालेको क्वाथ देनेका समय । वातपित्तकफैरेव रसरक्तसमुच्चयात् ॥ जायते यो ज्वरः सम्यक् पक्वे क्वाथं तु दापयेत्॥४०॥ वात, पित्त, कफ, रस, रक्त इनके संचयसे जो ज्वर उपजे वह जब अच्छीतरह पक- जावे तब क्वाथको देवे ॥ ४० ॥ अथ क्वाथका प्रकार । क्वाथः षष्ठविधः प्रोक्तः पाचनः शमनस्तथा ॥ दीपनः क्लेदनः शोषी सन्तर्पणो विशेषतः ॥ ४१ ॥ पाचन, शमन, दीपन, क्लेदन, शोषण, संतर्पण इनभेदोंसे क्वाथ छःप्रकारका कहा है ॥४१॥ अथ छः प्रकारसें क्वाथ देनेका समय । पाचनञ्च नरे देयं निशासु प्रविजानता॥पूर्वाह्ने शमनो देयोऽ- पराह्ने दीपनः स्मृतः ॥४२॥ सन्तर्पणो भेदनश्च कल्ये पानाय दापयेत् ॥ शोषणोऽपि प्रभाते च क्वाथःपाने प्रकीर्तितः॥४३॥ वैद्यको पाचनक्वाथ रात्रिमें देना और शमनक्वाथ दिनके प्रथमकालमें देना और दुपहरीके पश्चात् दीपनक्वाथ देना ॥ ४२ ॥ संतर्पण और भेदनक्वाथ प्रभातमें देना और शोषणक्वाथ भी प्रभातमें ही देना ॥ ४३ ॥ अथ औषधादिक देनेके समयकी संज्ञा । रात्रौ यः प्रथमो यामो भूतवेला प्रकीर्तिता ॥ द्वितीयं निशि इत्याहुर्निशीथञ्च ततः परम्॥ ४४॥ गणरात्रं ततो ज्ञेयं काल- मप्राप्तराशिनम्॥पूर्वापराह्लमध्याह्नाःपरार्द्धं दिनशेषकाः ॥४५॥ पूर्वे दिनावसाने च भेषजानामुपक्रमः ॥ ४६ ॥ रात्रिके प्रथम यामको भूतवेला कहते हैं और दूसरे यामको निशि कहते हैं और उससे परे निशीथ कहाता है ॥ ४४ ॥ उससे परे गणरात्र कहाता है और पूर्वाह्न, मध्याह्न, अप- राह्न, परार्द्ध, दिनशेष ऐसी संज्ञा हैं: ४५ ॥ प्रभातमें और सायंकालमें ओषधियोंका उपचार है ॥ ४६ ॥