भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 183

An exact transcription of the page into Devanagari text, with line-by-line markers:

अ० ६] भाषाटीकासमेता । (१५१) अथ श्रवण नक्षत्र । सप्ताहमादौ श्रवणे विंशतिर्मध्यमे मता ॥ षोडशाहं तृतीयांशे सत्यमेतद्रवीम्यहम् ॥ ४५ ॥ श्रवणके प्रथमभागमें रोग उपजे तो सात दिन पीडा रहती है और द्वितीयभागमें रोग उपजे तो बीसदिन पीडा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो सोलह दिन पीडा रहती है यह मैं सत्य कहता हूं ॥ ४५ ॥ अथ धनिष्ठा नक्षत्र । विंशतिर्वासवे पूर्वं मध्यमे मासयुग्मकम् ॥ मासस्तृतीये विज्ञेयो दैवज्ञैश्च निवेदितम् ॥ ४६ ॥ धनिष्ठाके प्रथमभागमें रोग उपजे तो बीस दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो दो महीने पीडा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो एक महीना पीडा रहती है ऐसा ज्योतिषियोंने कहा है ॥ ४६ ॥ अथ पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्र । वारुणे दारुणो रोगस्त्रिपक्षं प्रथमांशके ॥ द्वितीये मासषट्कं तु षोडशाहं तृतीयके ॥ ४७ ॥ पूर्वाभाद्रपदाके प्रथमभागमें दारुण रोग उपजे तो पैंतालिस दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो छःमहीने और तीसरे भागमें रोग उपजे तो सोलह दिन पीडा रहती है ॥ ४७ ॥ अथ उत्तराभाद्रपदा नक्षत्र । अहिर्बुध्न्ये पक्षमादौ मध्ये मासं विनिर्दिशेत् ॥ अन्तेऽष्टाविंशतिर्ज्ञेया पीडा स्यात्पापकर्मणि ॥ ४८ ॥ उत्तराभाद्रपदाके प्रथमभागमें रोग उपजे तो पंदरह दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो एक महीना पीडा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो अट्ठाईस दिन पीडा रहती है ॥ ४८ ॥ अथ रेवती नक्षत्र । रेवत्याः प्रथमे चाष्टौ द्विभागे तु च षोडश ॥ अन्ते त्रिंशद्दिनान्येवं प्रोक्तानि पूर्वसूरिभिः ॥ ४९ ॥ रेवतीके प्रथमभागमें रोग उपजे तो आठ दिन पीडा रहती है और दूसरे भागमें सोलह दिन पीडा रहती है और तीसरे भागमें तीस दिन पीडा रहती है ॥ ४९ ॥