भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 182

( १५० ) हारीतसंहिता। [ द्वितीयस्थाने-] विशाखाके प्रथम भागमें रोग उपजे तो अडतालीस ४८ दिन पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो बारह दिन पीड़ा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो भी बारह दिन पीड़ा रहती है ॥ ३९ ॥ अथ अनुराधा नक्षत्र। मैत्रांशे प्रथमे सप्त द्वितीये पक्षमादिशेत् ॥ तृतीयांशे चतुःषष्टिर्वासराणां महामुने ॥ ४० ॥ अनुराधाके प्रथम भागमें रोग उपजे तो सात दिन पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें रोग उपजे तो पंद्रह दिन पीड़ा रहती है और तीसरे भागमें पीड़ा उपजै तो हे महामुने ! चौसठ ६४ दिन पीड़ा रहती है ॥ ४० ॥ अथ ज्येष्ठा नक्षत्र। त्रिपक्षमैन्द्रे प्रथमे द्वित्रिभागे च षोडश ॥४१ ॥ ज्येष्ठाके प्रथम भागमें रोग उपजे तो ४५ दिन पीड़ा रहती है, द्वितीय और तृतीय इन भागोंमें रोग उपजे तो सोलह दिन पीड़ा रहती है ॥ ४१ ॥ अथ मूल नक्षत्र। मूलेऽशे तृतीये ज्ञेयः पक्ष एव मनीषिभिः ॥ आद्ये पूर्वत्रयो मासा मध्यमेऽहानि षोडश ॥ ४२ ॥ और मूलके तीसरे भागमें रोग उपजे तो पंद्रह दिन पीड़ा रहती है और मूलके प्रथम भागमें रोग उपजे तो तीन महीने पीड़ा रहती है और मूलके दूसरे भागमें रोग उपजे तो सोलह दिन पीड़ा रहती है ॥ ४२ ॥ अथ पूर्वा नक्षत्र। पूर्वांशे द्वितये ज्ञेयः पक्ष एव मनीषिभिः॥ तृतीयांशे पुनर्मृत्युर्तीरात्रात्प्रजायते ॥४३॥ पूर्वाषाढके प्रथम और द्वितीयभागमें रोग उपजे तो पंदरह दिन पीड़ा रहती है और तीसरे भागमें रोग उपजे तो रोगी मर जाता है ॥ ४३ ॥ अथ उत्तराषाढा नक्षत्र। विश्वेशे प्रथमे पक्षे मध्ये द्वादशरात्रिकम् ॥ दिनानां विंशतिः प्रोक्ता तृतीयांशे महामुने ॥ ४४ ॥ उत्तराषाढाके प्रथम और द्वितीयभागमें रोग उपजे तो बारह रात्रि पीड़ा रहती है, हे महा- मुने ! उत्तराषाढाके तीसरे भागमें रोग उपजे तो २० दिन पीड़ा रहती है ॥ ४४ ॥