भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( १५७ ) श्रेष्ठ नहीं है ॥ ९ ॥ जो मार्गमें शीघ्र गमन करे, बैठता और उठता हुआ मोहको प्राप्त और पैरोंको पसारकै प्रवेश करे और मस्तकपै हाथको स्थापित करे ॥ १० ॥ लोहा, काठ, तृण, इनमेंसे किसी चीजको भेदित करे अथवा इन्हींको छुवै नासिका और चूचीको छुवै ॥ ११ ॥ पृथिवीको पैरसे खोदे अथवा पृथिवीमें रेखाको करे अथवा नींदको प्राप्त हुआ हो वह दूत बुरा कहा है ॥ १२ ॥ शुभदूतके लक्षण । यः श्वेतवस्त्रावृतपूर्णपाणिः सम्पूर्णताम्बूलमुखः प्रशस्तः ॥ द्विजस्तथा माणवकः सुशीलः प्रज्ञाधिकश्चाह्वयते सुखाय १ ३॥ कुसुममुकुरवक्त्रं यस्य स्यात्सर्वदापि श्रमविकचसरोजं पद्मकिञ्ज- ल्कपुष्पम् ॥ करतलवरवस्त्रं पुष्पपूगाङ्गरागं करतलधृतमेतत्सौ- ख्यकर्ता हि दूतः ॥१४॥ आगत्योदीच्यपूर्वामथवरुणदिशमैशी- माश्रित्य शान्तो दृष्ट्वा वैद्यं प्रहस्य प्रवदति निपुणं नातिनीचं न चोच्चम्। उत्तिष्ठ त्वं प्रसादं कुरु पवन इदं सौख्यवाक्यं तनोति प्राज्ञैः स्वार्थं प्रकृष्टं सुखमगदकरं रोगिणां वैद्यलाभः ॥ १५॥ पूर्वा दिशं समासाद्य प्रशान्तः शान्तया गिरा ॥ वैद्यं वदति लाभाय रोगिणाञ्च सुखावहम् ॥१६॥ यश्चागत्योपविष्टोऽपि श्लोकं वाथ सुभाषितम् ॥ वदते शान्तया वाचा सोऽपि लाभाय शान्तये ॥१७॥ अभिवाद्यस्य वैद्यस्य क्षेमं पृच्छति यः पुनः॥ फलं ददाति पुष्पं वा रोगिणाञ्च सुखावहम् ॥ १८ ॥ जो सफेद वस्त्रोंको पहने हुये और किसी चीजको हाथमें लियेहुए और नागरपानको मुखमें धारण किये उत्तम देहवाला और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इन वर्णोंमें उपजा हुआ और बालक तथा शीलस्वभाववाला और बुद्धिमान् ऐसा दूत वैद्यको बुलानेमें सुखको देता है ॥ १३ ॥ जिसका मुख फूल तथा शीशाके समान स्वच्छ सब कालमें रहे और श्रमसे खिलेहुए कमलोंकी केसर और पुष्पोंवाला हो और हस्तोंके तलुओंपर भी वस्त्रको धारणकिये हो, अनेक प्रकारके फूल और सुपारीको हाथमें धारणकिये हो ऐसा दूत सुखको देनेवाला है ॥१४॥ जो आके उत्तरको व पूर्वको, पश्चिम व ईशान दिशामें बैठ और वैद्यको देख हँसता हुआ न ज्यादा ऊंचेप्रकारसे और न ज्यादा नीचेप्रकारसे बोले कि, हे वैद्यराज ! उठक प्रसन्नता करो ऐसे शुभवचनको कहे ऐसा १ अत्र छन्दोभंगः ।