भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 548 में से

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पृष्ठ 191

अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( १५९ ) द्वाजिच्छिक्करच्छागसंज्ञः ॥ एते श्रेष्ठा दक्षिणे सव्यवामे वैद्य- वेशे निर्गमे श्रेयसे च ॥ ३ ॥ राजा, हस्ती, ब्राह्मण, मोर, खंजना, पपैया, सफेद वस्त्रोंवाला, धोबी, पुत्रसे युक्त हुई स्त्री, वेश्या, कन्या प्रथम देखे हुये ये शकुन यशको और सुखको देते हैं ॥ २ ॥ ग्राममें रहनेवाली चिडिया, शिकरा, भासपक्षी, हरीवां या हरदिहा, चकुवा, मुर्गाविशेष, छिक्कर, बकरा ये सब वैद्यके चलने और प्रवेश करनेमें दाहिने और बायें श्रेष्ठ हैं ॥ ३ ॥ अथ दुष्ट शकुन । सर्पोलूको वानरःसूकरश्च गोधा ऋक्षो गिरगिटो वै शशश्च॥एते- ऽरिष्टा निर्गमे वा प्रवेशे कार्य्ये निर्घातोपकारेषु शस्ताः ॥४॥ सर्प, उल्लू, वानर, शूकर, गोह, रीछ, गिरगिट, शशा ये सब वैद्यके गमन और प्रवेशमें अच्छे नहीं हैं और घात करनेके कार्य्यमें ये भी शकुन अच्छे हैं ॥ ४ ॥ अथ मृगादिकोंका शकुन । मृगो वा पिङ्गलो वापि प्रशस्तो दक्षिणे सदा ॥ निर्गमे वा प्रवेशे च दक्षिणे शुभदायकः ॥ ५ ॥ मृग अथवा उल्लू सबकालमें दाहिने श्रेष्ठ है और वैद्यके गमनमें तथा प्रवेशमें भी दाहिने ही शुभको देते हैं ॥ ५ ॥ अथ मृगोंके संख्याका शकुन । संख्ययैकत्रयः पञ्चनवसप्तसमारुख्यया ॥ भाग्यकाले नराणां तु मृगा यान्ति प्रदक्षिणाः ॥ ६ ॥ एक अथवा तीन अथवा पांच अथवा सात अथवा नव ऐसी संख्याके मृग मनुष्योंके भाग्यकालमें दाहिने गमन करनेवाले होते हैं ॥ ६ ॥ अथ मोरआदिकोंका शकुन । शिखी च भवनगोधा रासभो भृङ्गराजः पिकभषणकपोताः पोतकी सूकरी वा॥ तदनु विहगराजो दीर्घकण्ठादयः स्युर्वदति शकुनवेत्ता वामतो निर्गमे वा॥ ७॥ तित्तिरः क्रकरः क्रौञ्चसा- रसाभाससूकराः ॥ खगः किरीटी वामे तु सदा शुभतरा मताः ॥ ८॥ भवन्ति निर्गमे चैते सर्वकार्य्यसुसिद्धये ॥ ९॥ मोर, घरमें रहनेवाली गोह, गधा, धूम्याटपक्षी, कोयल, कुत्ता, कबूतर, काली चिडी, १ छन्दोभंगः ।

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