भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( १३५ ) चतुर्थोऽध्यायः अथ व्याध्यरिष्टका लक्षण । आत्रेय उवाच॥उपद्रवैश्च ये पुष्टा व्याधयो यान्ति वार्यताम्॥ रसायनादिना वत्स तान्मेदेकमनाः शृणु ॥ १ ॥ उपद्रवोंसे युक्त हुए रोग रसायन आदिसे निवारण किये जाते हैं। हे पुत्र ! उन रोगोंको एकमन होके सुनो ॥ १ ॥ अथ अष्ट महाव्याधियोंका नाम । वातव्याधिः प्रमेहश्च कुष्ठमर्शो भगन्दरम्॥ अश्मरी मूढगर्भश्च तथा चोदरमष्टमम् ॥ २ ॥ अष्टावेते प्रकृत्यैव दुश्चिकित्स्या महागदाः ॥ ३ ॥ वातव्याधि, प्रमेह, कुष्ठ, बवासीर, भगंदर, पथरी, मूढगर्भ, आठवाँ उदररोग ॥ २ ॥ ये आठों प्रकृति करके महारोग दुश्चिकित्स्य हैं ॥ ३ ॥ अथ आठ महारोगोंके उपद्रव । प्राणमांसक्षयश्वासतृष्णाशोषवमिज्वरैः॥मूर्च्छातिसारहिक्काभिः पुनरेतैरुपद्रुताः ॥ ४ ॥ वर्जनीया विशेषेण भिषजा सिद्धि- मिच्छता ॥ ५ ॥ बलक्षय, मांसक्षय, श्वासरोग, तृषा, शोष, छर्दि, ज्वर, मूर्च्छा, अतिसार, हिचकी इन उपद्रवोंसे युक्त हुए पूर्वोक्त महारोग ॥ ४ ॥ सिद्धिकी इच्छा करनेवाले मनुष्यको वर्जने चाहिये ॥ ५ ॥ अथ ज्वररोगीके अरिष्ट । यस्य जिह्वा भवत्तीव्रा पीता वा नीलसम्भवा॥श्वासो भवत्य- तीवोष्णः शरीरं पुलकांकितम् ॥ ६ ॥ नीलनेत्रेऽरुणे पीते कण्ठो घुरघुरायते॥न जीवति ज्वरार्त्तस्तु लक्षणं यस्य चेदृशम् ॥७॥ मुखे श्वासो भवेद्यस्य श्वावा दन्तावली पुनः॥ स्तब्ध- नेत्रो बलाद्यः स्याज्ज्वरात नैव जीवति ॥ ८॥ बहुमूत्री बहु- श्वासी क्षामोऽरोचकपीडितः ॥ हतप्रभेन्द्रियो यश्च ज्वरी