हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३६ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- शीघ्रं विनश्यति ॥ ९ ॥ यस्यास्ये श्रूयते रक्तं शिरोर्तिर्यस्य दृश्यते ॥ अन्तर्दाहो बहिःशीतो ज्वरस्तु मृत्युमृच्छति॥१०॥ यस्ताम्यति विसंज्ञस्तु शेत विपतितोऽपि वा॥शीतार्दितोऽन्त- रुष्णश्च ज्वरेण म्रियते नरः ॥११॥ यो हृष्टरोमा रक्ताक्षो हृदि संघातशूलवान्॥नित्यं च वक्रेणोच्छ्वासः स ज्वरो हन्ति मान- वम् ॥१२ ॥ हिक्काश्वासपिपासार्त्तं मूढं विभ्रान्तलोचनम् ॥ सन्ततोच्छ्वासिनं क्षीणं नरं क्षपयति ज्वरः ॥ १३ ॥ आविलाक्षं प्रताम्यं च तन्द्रायुक्तमतीव च॥ क्षीणशोणितमांसं च नरं नाश- यति ज्वरः ॥ १४॥ घनं निष्ठीवनं नेत्रं प्लावा रोचकपीडितम्॥ अन्तर्दाहोऽसिता जिह्वा शीघ्रं नाशयति ज्वरः ॥१५ ॥ जिसकी खरखरी, पीली और नीली ऐसी जीभ हो जाय और अत्यंत गरम श्वास आवे और हर्षित हुए रोमोंकरके युक्त शरीर हो ॥ ६ ॥ नीले, लाल और पीले नेत्र हो जावें और कंठ घुर्घुर करे ऐसे लक्षण जिस ज्वररोगीके होवें उसका जीवना नहीं है ॥ ७ ॥ जिसके मुखमें शीघ्र श्वास आव और दंतोंकी पंक्ति काली हो जावे और वरबस स्तंभित नेत्र हो जावें ऐसा ज्वरसे पीडित रोगी नहीं जीता है ॥ ८ ॥ बहुत मूत्रको करनेवाला और बहुत श्वासको लेनेवाला और कृश और अरुचिसे पीडित और नष्ट हुई इन्द्रियोंकी कांतिवाला ऐसा ज्वररोगी शीघ्र मर जाता है ॥ ९ ॥ जिसके मुखसे रक्त गिरे और जिसके शिरमें पीड़ा होवे और भीतर दाह और बाहर शीत लगे ऐसे ज्वरवाला मर जाता है ॥ १० ॥ जो मोहको प्राप्त होवे और संज्ञासे रहित हुआ सोवे अथवा निरंतर पतित हुआ करे और बाहर शीतसे और भीतर गर्मीसे पीडित होवे ऐसा मनुष्य ज्वरसे मर जाता है ॥ ११ ॥ जो हर्षित हुए रोमोंवाला हो और लालनेत्रोंवाला हो और हृदयमें दारुण शूलवाला हो और निरंतर मुखसे ऊंचे श्वासको लेता हो ऐसा ज्वररोगी मर जाता है ॥ १२ ॥ हिचकी और श्वाससे पीडित और मूढ़ और विशेष करके भ्रमते हुए नेत्रोंवाला और निरंतर ऊंचे श्वासको लेनेवाला और क्षीण ऐसे रोगीको ज्वर मार देता है ॥ १३ ॥ धूम्रवर्णवाले नेत्रोंवाला और मोहको प्राप्त हुआ और तंद्रासे अत्यंत युक्त हुआ, क्षीण हुए रक्त और मांसवाला ऐसे मनुष्यको ज्वर मार देता है ॥ १४ ॥ बहुत छर्दिवाला और नेत्रोंसे पानीको गिरानेवाला और अरोचकसे पीडित और भीतर दाह तथा काली जीभसे युक्त ऐसे मनुष्यको ज्वर शीघ्र मार देता है ॥ १५ ॥ १ 'इन्द्रियार्थेष्वसंवित्तिर्गौरवं जृम्भणं क्लमः। निद्रार्तस्येव यस्येहा तस्य तंद्रा विनिर्दिशेत् ॥'