हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४२ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- अथ उन्मादरोगका अरिष्ट । अवाङ्मुखस्त्वून्मुखो वा क्षीणमांसबलोत्तरः ॥ जागरूकस्त्वसंदे- हमुन्मादेन विनश्यति ॥४७॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे द्वितीयस्थाने व्याध्यरिष्टं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ नीचेको मुख रखनेवाला अथवा ऊपरको मुख रखनेवाला और क्षीण हुए मांसवाला और बलसे युक्त हुआ अथवा उत्तरोत्तर जिसका मांस और बल क्षीण होता जावे और दिन रात जागनेवाला ऐसा उन्मादरोगी निश्चय मर जाता है ॥ ४७ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां द्वितीयस्थाने व्याध्यरिष्टं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पंचमोऽध्यायः ५. अथ पञ्चेन्द्रियविकार वर्णन । आत्रेय उवाच ॥ यः शीलवान्क्रोधनतामुपैति यः क्रोधवाञ्छी- लगुणं च धत्ते ॥ द्वावेव मृत्युं तनुतो विधिज्ञ स्थूलो नरः शीघ्र- तरं कृशाङ्गः ॥१॥ आत्रेयजी कहते हैं-जो शीलवान मनुष्य क्रोधपनेको प्राप्त होवे और जो क्रोधी मनुष्य शीलपनेको धारण करे हे विधिज्ञ ! ये दोनों मनुष्य मृत्युको शीघ्र प्राप्त होते हैं और जो मोटा मनुष्य शीघ्र कृशाङ्ग हो जावे और कृशाङ्ग मनुष्य शीघ्र मोटा हो जावे ये भी दोनों मृत्युकों प्राप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥ यो धर्मशीलो भवतीह पापी पापात्मको धर्मरतो यदि स्यात् ॥ स मृत्युभाजी भवतीह शीघ्रं यश्च प्रकृत्या विकृतिं प्रयाति ॥२॥ जो धर्मशील मनुष्य पापी हो जावे और जो पापी धर्मको करने लगजावे और जो प्रकृति करके विकारको प्राप्त हो जावे ये मनुष्य शीघ्र मृत्युको प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥ यो गौरवर्णो विदधाति काष्ण्यं कृष्णोऽतिगौरत्वमुपैति यश्च ॥ तथा मृतिं याति नरः प्रकृत्या शीघ्रं विकृत्या भजते वियोगम्३ जो गौरवर्णवाला मनुष्य काले वर्णको प्राप्त हो जावे और जो काले वर्णका मनुष्य गौर- पनेको प्राप्त हो जावे और जो अपनी प्रकृतिको शीघ्र त्याग देवे ऐसे मनुष्य शीघ्र मृत्युको प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥