हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] भाषाटीकासमेता ( २१५ ) मूल्पतिसामान्या योज्या पित्ते कनीयसी ॥ महती पञ्चमूली तु वातश्लेष्मज्वरे हिता ॥ १९ ॥ पञ्चमूल, खरैहंटी, बेलगिरी, गिलोय, नागरमोथा, सोंठ, श्योनापाठा, चिरायता, नेत्रवाला, कूड़े- की छाल, इन्द्रजव इन्होंका क्वाथ ॥ १७ ॥ सबप्रकारके अतीसार, छर्दि, श्वास्ररोग, ज्वर शूल, इन्होंको नाशता है ॥ १८ ॥ पित्तदोषमें लघुपञ्चमूल वर्तना। वात और कफदोषमें बृहत्प- ञ्चमूल वर्तना ॥ १९ ॥ अथ उत्पलादिपाचन । उत्पलं दाडिमत्वक्च केशरं तथा मधु पद्मकम् ॥ धात्री पिष्टा तण्डुलतोयैः पाचनं ज्वरातिसारघ्नम् ॥ २०॥ नीला कमल, अनारकी छाल, केशर, कमल, मौरेठी आंवला इन्होंको चावलोंके पानीसे पीस शहद मिला पीवे । यह पाचन ज्वरातिसारको नाशता है ॥२० ॥ अथ उशीरादि क्वाथ । उशीरं धान्यकं मुस्तं सबिल्वं बालकं बला ॥ तथा च धातकी- पुष्पं कषायस्य प्रशस्यते ॥२१ ॥ ज्वरातिसारशमनं सहशो- णितपैत्तिकम् ॥निहन्ति शोफं सकलं रुचिप्रदविपाचनम्॥२२॥ खश, धनियां, नागरमोथा, बेलगिरी, नेत्रवाला, खरैहंटी, धवके फूल इन्होंका क्वाथ श्रेष्ठ है ॥ २१ ॥ ज्वरातिसार, रक्तातिसार, पित्तातिसार, सब प्रकारका शोजा इन्होंको शांत करता है और रुचिको देता है और पाचन है ॥ २२ ॥ विगतामातिसारं चिरोत्थितं रक्तसहितमतिवृद्धम्॥ मधुना सहितः शमयत्यरलुः पुटपाकनिर्यासितः॥२३॥ श्योनापाठाको पुटपाककी विधिसे पकाके रसको निचोड़ उसमें शहद मिला पीवे यह पक्कातिसार और पुराना अतीसार और बढे हुए रक्तातिसारको भी नाशता है ॥ २३ ॥ जम्ब्वादिस्रवरस । जम्बूवटोदुम्बरप्लक्षको हि नागश्च प्रपौण्डरिकं शमी च॥गुन्द्रः सचूतोऽम्बुदजीविकाया आसां हि पुत्रञ्च सदा विदध्यात्२४॥ प्रस्थद्वयेन प्रपिबेद्वि तावद्यावद्विशेषांशमिदं प्रजायते ॥पुनः कटाहे विपचेच्च सम्यग्दार्वाप्रलेपः स्वरसश्च यावत् ॥ २५ ॥ उत्तार्य नूनं भिषगुत्तमेन क्षौद्रेण मिश्रं हरतेऽतिसारम्॥२६॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu