भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 248

( २१६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- जामुन, बड़, गूलर, पकरिया, नागकेशर, कमल, जाठी, मोथा, तृण, आंब, नागरमोथा, जीवंती इन्होंने फूलोंको सबकालमें लेवे ॥ २४ ॥ पीछे १२८ तोले पानीमें पकावे । जब चौथाईभाग शेष रहे तब छानके फिर कढ़ाईमें घालि फिर पकावे जब कड़छीपर चेपनेलगे ॥ ॥ २५ ॥ तब उतार उत्तमवैद्यको निश्चय शहद मिला रोगीको देना चाहिये यह अतिसारको हरता है ॥ २६ ॥ काकमाचीका प्रयोग । हारीतेन तथा प्रोक्ता काकमाची सुपूजिता ॥ आलोक्यानेकशास्त्राणि आत्रेयेणापि पूजिता ॥ २७ ॥ जैसे अनेक शास्त्रोंको देख आत्रेयजीने काकमाची अर्थात् भोलणीनामसे प्रसिद्ध मकोह- विशेष ओषधी पूजित की है तैसे ही हारीतने भी यही ओषधी पूजी है अर्थात् अतिसारमें श्रेष्ठ समझी है ॥ २७ ॥ जंबृत्वगादिका अवलेह । जम्बूत्वचं वत्सकवल्कलं च निष्क्वाथ्य नूनं सलिले समीरणम्॥ चतुर्विभागेष्वपि शोषितेषु उत्तार्य्य वस्त्रेष्वथ गालयेच्च ॥ २८ ॥ पुनः कटाहै विपचेच्च सम्यग्दार्वांप्रलेपः स्वरसस्तु यावत् ॥ उत्तार्य्य शीते मधुना विमिश्रं लीढं हरेदप्यतिसारमुग्रम् ॥२९॥ जामनकी छल, कुड़ाकी छाल, इनका पानीमें क्वाथ बना जब चौथाई भाग शेष रहे तब उतारि वस्त्रसे ॥ २८ ॥ छान फिर कड़ाहीमें घाल अच्छीतरह पकावे । जब कड़छीपै चिपकने लगे और स्वरसरूप रहे तब अग्निसे उतार शीतलकर शहद मिला चाटे । यह दारुण अतीसारको हरता है ॥ २९ ॥ अतिसारका पूर्वरूप । कुक्षौ दरे वक्षसि नाभिदेशे पायुप्रदेशे सततं निरुद्धे ॥ वातस्य रोधश्च शकृद्विभङ्गो भवन्ति सर्वेष्वतिसारकेषु॥३०॥ सर्व अतिसाररोगमें कुक्षि,उदर, छाति,नाभिदेश,गुदामण्डल, ये सब स्थान रुकंकर अधोवा- युका रोध और विष्ठाका भंग होता है ॥ ३० ॥ अथ वातातिसारका लक्षण और चिकित्सा । सफेनिलं पिच्छलमेव रूक्षमल्पं शकृदामसशब्दशूलम् ॥कृष्णं भवेद्गात्रविचेष्टनञ्च वातातिसारे प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥ ३१ ॥

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक) · पृष्ठ 248, कुल 548 में से · BharatKosha