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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 548 में से

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पृष्ठ 249

अ० ३ ] भाषाटीकासमेता । (२१७) तस्यादौ लङ्घनं चैकमल्पे वा नैव लंघनम्॥ तस्माद्देयं कषायं तु पानभोजनमेव च ॥ ३२ ॥ झागोंसे मिलाहुआ गाढा और रूखा मल उतरे और थोड़ा वारवार आमसहित आवे और दिशाजानेके समय शब्द और शूलको उपजावे और शरीर आदि कृष्णवर्ण होजावे उसको वातातीसार कहते हैं ॥ ३१ ॥ उसके आदिमें एक लंघन करना और अल्पस्वरूप वाताति- सारमें लंघन नहीं करना उससे क्वाथ, पान, भोजन ये देने चाहिये ॥ ३२ ॥ अतिसारका पाचक कल्क । उदीच्यधान्यस्य जलेन कल्कं पाने हितं पाचयेतेऽतिसारम्॥ तृष्णापहं दाहविनाशनञ्च सशूलहिक्कासु विनाशनं स्यात्३३॥ नेत्रवाला, धनियां इनको पानीमें पीस कल्क बना खानेसे अतिसारको पकाता है और तृषा, दाह, शूल, हिचकी इनको नाशता है ॥ ३३ ॥ वालकादि कल्क । वालकद्वयमोचहरीतकीपर्पटेन सहितं जलेन च ॥ क्वाथपान- मिदमेवातिसारे नाशमाशु कुरुते च विट्छान्तिम् ॥ ३४ ॥ नेत्रवाला, खश, मोचरस, हरड़े, पित्तपापड़ा, इनका पानीमें क्वाथ बना अतीसार रोगी पीवे । यह विष्ठाको शांत करता है ॥ ३४ ॥ शालिपर्ण्यादिपानक । शालिपर्णी पृश्निपर्णी बृहती कण्टकारिका॥बालाश्वदंष्ट्रा बिल्वा- नि पाठा नागरधान्यकम् ॥३५॥एतदाहारसंयोगे हितं सर्वा- तिसारिणाम् ॥ शालवन, पिठवन, बडी कटेहली, छोटी कटेहली, नेत्रवाला, गोखरू, बेलगिरी, श्योनापाठा, -सोंठ, धनियां ॥ ३५ ॥ यह द्रव्य भोजनके संयोगमें अतीसार रोगियोंको हित हैं ॥ तिंदुकादिरसपानक । तिन्दुकत्वचमाहृत्य काश्मरीपत्रवेष्टिताम्॥३६॥मृदा विलिप्य विधिवद्दहेन्मृद्वग्निना भिषक् ॥ रसं गृहीत्वा मधुसंयुक्तं पानं सर्वातिसारघ्नञ्च ॥ ३७ ॥ और तेंदूआवृक्षकी छालको ले कंभारीके पत्तोंसे वेष्टित करे ॥ ३६॥ पीछे माटीसे विधिपू- र्वक लीपा कोमल अग्निसे दग्ध करे पीछे रस निकाल शहदसे संयुक्त कर पीवे यह सबप्रकारके अतीसारोंको नाशता है ॥ ३७ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

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