हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( २२७ ) ये पूर्वोक्त तीनों प्रकारकी संग्रहणियोंके लक्षण मिलें और मुखमें मधुर स्वाद आवे और दाह, मूर्च्छा, श्वास, जड़पना ये उपर्जे उसको सन्निपातकी ग्रहणी जानिये ॥ ९१ ॥ अथ वातग्रहणीका पाचन । दारुनागरनिशा सवासका कुण्डली मगधजा शटी घनम् ॥ रास्ना सबाङ्गी सरलाह्वपुष्करं पाचनं भवति वातिकग्रहे ॥९२ देवदारु, सोंठ, हलदी, वांसा, गिलोय, पीपल, कचूर, नागरमोथा, रास्ना, भारंगी, सालवृक्ष, पोहकरमूल इन्होंका पाचन वातकी संग्रहणीमें हित है ॥ ९२ ॥ अथ पित्तग्रहणीका पाचन । नलवेणुकुशानां च काशेक्षूणां च मूलकम् ॥ क्वाथपानं हितं वास्य पाचनं पैत्तिके ग्रहे ॥ ९३ ॥ नरशल, बांस, डाभ, कांस, ईख इन्होंकी जड़को पानीमें औटावे । यह पाचन पित्तकी संग्रहणीमें हित है॥ ९३ ॥ अथ कफग्रहणीकी औषध । व्याघ्रीग्रन्थिकचव्यसुरसा शुण्ठी दाडिमम् ॥ रजनी घनचित्रकमेवं हिक्काघ्नं कफग्रहणीं हन्ति॥९४॥ कटेहली, पीपलामूल, चव्य, तुलसी, सोंठ, अनारकी छाल, हलदी, नागरमोथा, चीता इन्होंका क्वाथ हिचकी और कफकी संग्रहणीको हरता है ॥ ९४ ॥ अथ शुण्ठ्याद्यमृतप्राशन । शुण्ठी कणा द्विरजनी च घनं तथा च योज्यः पुनः प्रतिविषं त्रिफला विडङ्गः ॥ सिन्धूत्थवह्नित्रिकटुं त्रिसुगन्धियुक्तं चूर्णं पुनर्गुडयुतं घृतमिश्रितं च ॥ ९५ ॥ कृत्वा बिडालपदमात्रक- मोदकांश्च भक्षयथा जलमपि ग्रहणीगदे च॥ अर्शोभगन्दरमरो- चकगुल्ममेहाञ्छूलाश्मरीकृमिरोगहरं च पाण्डुम् ॥९६॥ श्रेष्ठं रसायनमिदं बलिनाशनंस्याद्दृष्यं बलं विदधतेऽतिकृशत्वदोषम् वर्णेन्द्रियसकलदीप्तिकरं रुजोध्नं कुष्ठभ्नापापहरणं कुरुते सदैव ९७ सूंठ, पीपल, हलदी, दारुहलदी, नागरमोथा, अतीश, हरड़ै, बहेडा, आंवला, वायविडंग, सेंधानमक, चीता, सोंठ, मिर्च, पीपल, दालचीनी, इलायची, तेजपात इनके चूर्णमें घृत और गुड़ मिला ॥९५॥ एक एक तोलेभरकी गोलियां बनाके पानीके साथ खावें ये गोलिय् Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu