भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 258

(२३६) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ गुल्मसंज्ञक ग्रहणीरोगका लक्षण । शोषो गलस्य तिमिरं किल पार्श्वशूलं नाभौ तथातिकृशताति- विषूचिका च॥ कर्णे स्वनोऽतिवमनं क्लमशूलमोहः श्वासेन गुल्म- मिति लक्षणमेव विद्धि॥८६॥ यस्यैतानि च लिङ्गानि गुल्मिनं तं विदुर्बुधाः॥ग्रहणी नाम साध्यो यस्तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् ८७ कण्ठका शोष हो, अंधेरी आवे, पसली और नाभिमें शूल हो, शरीर अत्यन्त कृश हो जावे और अत्यन्त विषूचिका रोग उपजे, कानमें शब्द हो, अत्यन्त छर्दि आवे और ग्लानि, शूल, मोह, श्वास, गुल्मरोग ये उपजें ॥ ८६ ॥ ये जिसके लक्षण हों उसके गुल्मसंज्ञक ग्रहणीरोग जानना, ग्रहणीरोग साध्य है उसके लक्षण कहता हूँ ॥ ८७ ॥ अथ वातकी संग्रहणीका लक्षण । चित्रं सशब्दं सृजतेऽत्र वर्चःशोफोऽनिलो वर्चमतीव रूक्षम् ॥ श्वासार्त्तियुक्तं तनुशैथिलं च स्रावो ग्रहण्यानिलकोपतःस्यात् ८८ चित्र और शब्दसहित मल उतरे, वह मल अत्यन्त रूखा हो, वातसे शोजा उपजे, श्वासरोग और शरीरमें शिथिलपना और स्राव हो ये लक्षण हों तब वातकी संग्रहणी जानिये ॥ ८८ ॥ अथ पित्तकी संग्रहणीका लक्षण । विदाहि शीर्णं सरुजं तृषार्त्तं दुर्गन्धपीतारुणनीलकालम् ॥ संसृज्यते यस्य मलो विमिश्रः पित्तोद्भवा सा ग्रहणीति संज्ञा ८९ दाह, शूल, तृषा, दुःख इन्होंसे युक्त रोगी होवे, दुर्गन्धसे मिला हुआ और पीला, लाल, नीला, काला इन रंगोंसे मिला हुआ मल उतरे ये लक्षण होवें तब पित्तकी संग्रहणी जाननी ८९ अथ कफकी संग्रहणीका लक्षण । हृल्लासछर्दी श्वसनं च शोफः कासो जडत्वं च सशीतता च ॥ वैरस्यमास्ये गुरुगात्रता स्यादरोचकं शंखशकृद्ग्रहस्तु ॥९०॥ थुकथुकी हो, छर्दि आवे और श्वास, शोजा, खांसी, जडपना, शीतलता ये उपजें और मुखमें विरसपना हो, शरीरका भारीपना हो, अरुचि हो और गुदाकी आंठीमें मलकी कब्ज हो उसको कफकी संग्रहणी जानना ॥ ९० ॥ अथ सन्निपातकी संग्रहणीका लक्षण । त्रिभिः समेतं गदितं च चिह्नमेतस्य कोपो मधुरास्यता वा ॥ दाहोऽथ मूर्च्छा श्वसनं जडत्वं स सन्निपातग्रहणीगदः स्यात् ९१