हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 257, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंपश्चात् दोषोंसे युक्त हुई ग्रहणी पेटकी अग्निको शांत करे और भोजन करके संचित हुआ मलका अंश बहुत दिनोंतक नित्यप्रति निसरे और बारंबार कब्ज करके पका हुआ और कठिन मल उतरे तिसको ग्रहणीदोष कहते हैं । यह घोररूप दुष्ट रोग मनुष्योंको पीडा देता है ॥ ८० ॥ • अथ ग्रहणीके प्रकार । लक्षयेच्चातिसारे च विज्ञेयं ग्रहणीगदम् ॥ वातिकं पैत्तिकं चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम्॥८१॥ नैव चैकेन दोषेण जायते ग्रह- णीगदः ॥ तेन संक्षीयते देहमन्तर्दाहो विपाकता ॥ ८२ ॥ अतिसारमें ग्रहणीरोगको जानना, वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज ऐसे ग्रहणीरोग होता है ॥ ८१॥ एक दोष करके ग्रहणीरोग नहीं उपजता । उसकरके मनुष्यका शरीर छीजता है और शरीरके भीतर दाह होती है और अन्न नहीं पचता ॥ ८२ ॥ अथ ग्रहणीका उपद्रव तथा गुल्मादिकोंकी संप्राप्ति । तिक्तः कषायकटुकाम्लविदाहिरूक्षः शीताल्पभोजनपरैः श्रम- मैथुनैश्च॥भाराध्वहस्तिरथवाहनधावनेन संक्रुद्धवायुहननेऽनल- वेगमेनम् ॥ ८३ ॥ कडुआ, कसैला, चरचरा, खट्टा, दाह करनेवाला, रूखा, शीतल, थोडा, ऐसे भोजनोंको नित्यप्रति सेवनेसे, परिश्रम और मैथुनके अत्यंत सेवनेसे और बोझ, मार्गमें ज्यादा चलनेसे, हस्ती, रथ, घोडा इनमें बैठके भागनेसे क्रुद्ध हुआ वायु अधोवातके वेगको नाशता है ॥ ८३ ॥ तस्मात्तद्ग्रमनिलेन च छिद्यमानं रक्तेन युक्तमनिले परिपाक- मेति ॥ संजायतेऽपि मनुजस्य तथा तृतीयं गुल्मेति नाम स च पञ्चविधो बभूव ॥ ८४ ॥ प्लीहा यकृज्जठरकण्डुमलस्य बन्धो- ऽष्ठीला क्रिमिर्जठररोगभवोऽथ षष्ठः ॥ एते भवंति ग्रहणीपरि- वर्त्तमाना घोरास्तथा दुःखदाश्च मनुजस्य चित्ते ॥ ८५ ॥ उससे रुके हुए वायु करके छिद्यमान हुआ रक्त परिपाकको प्राप्त होता है तब मनुष्यके एक गोला उपजता है, ऐसे पांच प्रकारका ग्रहणी दोष जानना ॥ ८४ ॥ तिल्लीरोग, यकृद्रोग, उदररोग, खाज, मलबन्ध, कृमिरोग इनसे संयुक्त ग्रहणीरोग छठा भी होता है । ये सब घोररूप रोग मनुष्यको दुःखके देनेवाले ग्रहणीके ही विकारसे होते हैं ॥ ८५ ॥ १५