हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 256, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( २२४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ अतिसारविशेषता । लशुनकुणपगन्धं पूयगन्धं घनं वा पललजलसमानं पक्वजम्बू- निभं वा ॥ घृतमधुपयसाभं तैलशैवालनीलं सघनदधिसवर्णं वर्जयेच्चातिसारसम् ॥७५॥ भ्रममदनमथार्शः शूलमूर्च्छाविदाहं श्वसनमतिविवर्णं छर्द्दिमूर्च्छातृडार्त्तम् ॥ विकलमतिशयेन सौ- ख्यशोफज्वरार्त्तः स परिहरतु दूरं सद्भिधाता न दृष्टः ॥ ७६ ॥ शोफं शूलं ज्वरं तृष्णां श्वासं कासमरोचकम्॥ छर्दिं मूर्च्छां च हिक्कां च दृष्ट्वातीसारिणं त्यजेत् ॥ ७७ ॥ दृष्ट्वा शोफं तथाध्मानं हिक्कां छर्द्दिमरोचकम् ॥ तथा च पाण्डुरोगात्तर्मतिसारयुतं त्यजेत् ॥ ७८ ॥ लहसनकी गन्धके समान गन्धवाला और मुरदाके समान गन्धवाला और रादके गन्धकके समान गंधवाला, कठिन और मांसके पानीके समान तेल और शिवालके समान नीला और करड़ी दहीके समान वर्णवाला ऐसे अतिसारको वर्जे ॥ ७५ ॥ भ्रम, उन्माद, बवासीर, शूल, मूर्च्छा, दाह, श्वास, इनसे संयुक्त छर्दि और तृषासे पीड़ित अतिशय करके विकल शोजा और ज्वरसे पीड़ित ऐसा अतिसार वर्ज देना ॥ ७६ ॥ शोजा, शूल, ज्वर, तृषा, श्वास, खांसी, अरुचि, छर्दि, मूर्च्छा, हिचकी इनसे संयुक्त हुए अतिसाररोगीको त्यागे ॥ ७७ ॥ और शोजा, अफारा, हिचकी, छर्दि, अरुचि, पांडुरोग इनसे पीडित हुए अतिसाररोगीको त्यागे ॥ ७८ ॥ अथ अतिसारके भेद संग्रहणीरोगका निदान और चिकित्सा । यदल्पमल्पं क्रमशॊ निषेवितं मलं भगाधारगतं च नित्यम् ॥ हत्वान्तराग्निं कुरुते नरस्य विकारमाहुर्ग्रहणीति संज्ञाम्॥७९॥ निर्वृत्ते चातिसारे शमयति दहनं भूयसा दोषिताऽपि भुक्त्वा नाश्य मलांशं बहुदिनमनिशं सञ्चयित्वा निसर्त्ति ॥ वारं वारं विगृह्य सहजमसरलं पक्वमानं घनं वा दुर्व्याधिचौररूपो मनुज- रुजकरः स्यात्तथा ग्रहणीति ॥ ८० ॥ जो अल्प अल्प मल नीचेकी अंत्रोंमें प्राप्त हो नित्यप्रति उतरे और दोष शरीरकी अग्निको नष्टकर विकारको उपजावे उसको ग्रहणीरोग कहते हैं ॥ ७९ ॥ अतिसारके निवृत्त होनेके