हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 255, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३] भाषाटीकासमेता । ( २२३ ) त्रिदोषसन्निपातोत्थश्चातिसारश्च दारुणः॥ शूलमूर्च्छाभ्रमाना- हकामलानां विपाचनः॥६९॥ क्षतक्षीणक्षयाणां तु हितोऽयम- मृतो वटः ॥ ७० ॥ हरड़े, शालवन, पिठवन, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, गोखरू इनको पानीमें उबाल चौथा हिस्सा शेष रहे ऐसा क्वाथ बनावे ॥ ६५ ॥ पीछे अदरख, लाख, पीपल, कुटकी, अनारदाना, अनारकी छाल, दारुहलदी, कूडाकी छाल, अतीश ॥ ६६ ॥ वांसा, इन सबोंका चूर्ण बना पूर्वोक्तमें मिलावे और क्वाथसे आधा हिस्सा बकरीका दूध और आठवां हिस्सा घृतको मिला पकावे ॥ ६७ ॥ जब कड़छीपै चिपकने लगे तब जान १६ तोले गुड़ मिलाय सायंकालके भोजनमें देवे ॥ ६८ ॥ इससे सन्निपातका दारुण अतिसार, शूल, मूर्च्छा, भ्रम अफारा, कामला, ये शांत होते हैं ॥ ६९ ॥ क्षतक्षीण और क्षयरोगी इनको यह अमृतवटक हित है ॥ ७० ॥ अथ बिल्वादिचूर्ण । एकबिल्वागुरुरोध्रचूर्णं मध्वादियोजितम् ॥ रक्तातिसारशमनं बालानां क्षीणधातुकम् ॥ ७१ ॥ एक १ बेलगिरी, अगर, लोध, इनके चूर्णमें शहद मिला बालकको चटावे यह धातुओंको क्षीण करनेवाले रक्तातिसारको नाशता है ॥ ७१ ॥ अथ गुदाके निकसनेकों ( काँच ) बन्द करनेकी चिकित्सा । यदा गुह्यं निरस्येत्तु तदा कुर्य्यात्क्रियामिमाम् ॥ सहचर्य्या- बलानां च रसो ग्राह्यो घृतं पुनः॥७२॥ पक्वघृतेन लेपः स्या- त्तस्य चेदं प्रशस्यते ॥ अरणीपल्लवक्वाथो वाप्यं लोष्टं सचन्द- नम् ॥७३॥ प्रतप्तमथवाग्निनिभं तथा नरस्य निर्वाप्य काञ्जि- कमथ विदधीत तद्वत् ॥ सौख्यं च सम्यग्गुदसेचनकं प्रशस्त संवेश्य मध्यतो गुदं दृढबन्धनं स्यात् ॥ ७४ ॥ जब गुदाकी कांच निकसे तब यह क्रिया करनी, पीला कुरंटा और खरैहटीके रसमें घृतको पका लेप करना श्रेष्ठ है ॥ ७२ ॥ अरनीके पत्तोंके क्वाथमें चुल्हाकी माटी और चन्दनको गर- मकर बुझावे अथवा इसीरीतिसे कांजीको बनावे इनसे अच्छीतरह गुदाको सेचे ॥७३॥ और कांचको गुदाके बीचमें प्रवेश कर दृढबन्धन करना ॥ ७४ ॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu