हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २२२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- शूकरकी वसाके समान और तिलोंके समान कांतिवाला और मांसके धोवनके समान प्रकाशित और पके हुए जामनके फलके समान ऐसा मल उतरे तिसको सन्निपातका अती- सार जानिये ॥ ६० ॥ अथ कुटजाष्टक । तुलामथाद्र्रांगिरिमल्लिकायाः संकुट्य पक्त्वा रसमाददीत ॥ तस्मिन्सुपूते पलसंमिते च देयं च पिष्ठा सह शाल्मलेन ॥६१॥ पाठा समंगातिविषा समुस्ता बिल्वं च पुष्पाणि च धातकी- नाम्॥प्रक्षिप्य भूयो विपचेच्च तावद्दार्वीप्रलेपः सरसस्तु यावत् ॥ ६२ ॥ पीतस्ततः कालविदा जलेन मण्डेन च क्षौद्रयुतेन वापि ॥ निहन्ति सर्वमतिसारमुग्रं कृष्णं सितं लोहितपीतकं च ॥ ६३ ॥ दोषं ग्रहण्यां विविधं च रक्तं पित्तस्य चार्शांसि स- शोणितानि॥ असृग्दरं चैवमसाध्यरूपं निहन्त्यवश्यं कुटजा- ष्टकोऽयम् ॥ ६४ ॥ सफेद कूड़ाका गीला फूल अथवा छाल, एक तुलाभर ले कूटकर उसका रस निकाल कर छान ले फिर उसमें मोचरस !। ६१ ॥ सोनापाठा, मँजीठ, अतीश, नागरमोथा, बेलगिरी, धायका फूल, इन औषधोंको डारके चुल्हेपर पकावे, जब कड़छाको लेप होनेलगे, तब उतार रक्खे ॥ ६२ ॥ जब पीनेका समय आवे, तब पानीके साथ अथवा मंडके साथ किंवा शहद- दके साथ पिलावे यह कुटजावलेह भयंकर काला, सफेद, लाल, पीला ऐसे अतिसारको नष्ट करता है ॥ ६३ ॥ तथा ग्रहणीके अनेक दोष, रक्त, पित्त, रक्तके बवासीर और असाध्य असृग्दर इन रोगोंको अवश्य नष्ट करदेता है ॥ ६४ ॥ अथ अमृतवटक । पथ्यापञ्चमूलक्वाथश्चतुर्भागावशेषतः॥ तत्र क्वाथे पुनश्चूर्णमि- मानि चौषधानि तु॥६५॥ शृङ्गवेरं तथा लाक्षा पिप्पली कटु- रोहिणी ॥ दाडिमफलत्वक्चूर्णं दार्वी सवत्सकं विषम् ॥६६ ॥ आटरूषकचूर्णानि संक्षिप्यात्र निघट्टयेत् ॥ आजं दुग्धं तदर्द्धेन घृतं चाष्टांशकं क्षिपेत्॥६७॥ दार्व्या विलेपितं ज्ञात्वा गुडस्य षोडशानि तु ॥ पलानि मिश्रितं तत्र देयमप्रातराशने ॥ ६८ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu