भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( २२९ ) अथ द्राक्षादिपिंडी । द्राक्षाक्षीरेण पक्त्वा यावद्धनं दर्व्युपलेपि च ॥ दृष्ट्वा पश्चात्तैः समालोड्य चेमान्यौषधानि मतिमान् ॥ १०४॥ पर्पटातिविषा मूर्वा पटोलं घनवालकम् ॥ तथाभयानां चूर्ण तु समशर्करया युतम् ॥१०५॥ तेन क्षीरेण संयोज्य विदार्य्याः कन्दमेव च ॥ घृतेन नवनीतेन पिण्डं कृत्वाऽथ भक्षयेत् ॥१०६॥ सपित्तग्रह- णीपाण्डुकामलार्तितृषापहम् ॥ भ्रमं मूर्छां तथा हिक्कां तमको- न्मादमश्मरीम् ॥ १०७ ॥ मेहपित्तासृजं कुष्ठं नाशयत्याशु निश्चितम् ॥ १०८ ॥ इति द्राक्षादिक्षीरम् ॥ इति आत्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने अतीसारचिकित्सानाम तृतीयो- ऽध्यायः ॥ ३ ॥ दाखोंको दूधमें मिला पकावे जब कड़ा होके कडछीपै चिपकने लगे तब बुद्धिमान् वैद्य इन औषधोंको डाले ॥ १०४ ॥ पित्तपापड़ा, अतीस, मरोडफली, परवल, नागरमोथा, नेत्रवाला, हरडे इनके चूर्णको और बराबरकी खांडको मिलावे ॥ १०५ ॥ पीछे उस दूधमें विदारीकंद और नौनीघृत मिला गोली बनाके खावे ॥ १०६ ॥ यह पित्तकी संग्रहणी पांडुरोग, कामला, तृषारोग, भ्रम, मूर्छा, हिचकी, तमक, श्वास, उन्माद, पथरी ॥ १०७ ॥ प्रमेह, रक्तपित्त, कुष्ठ इनको शीघ्र नाशता है ॥ १०८ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहाय- सूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने अतिसारचिकित्सानाम तृती- योऽध्यायः ॥ ३ ॥ चतुर्थोऽध्यायः ४. अथ गुल्मचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि गुल्मानां चैव लक्षणम् ॥ तस्मात्तेषां प्रतीकारमौषधानि विशेषतः ॥ १॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! सुन, गुल्मोंके लक्षणको कहता हूं और उनकी चिकित्सा और औषधको भी विशेषकर कहता हूं ॥ १ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu