भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 262

( २३० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने ] अथ गुल्मके भेद । पञ्चधा संभवन्त्येते गुल्मा जठरसंमृताः॥हृत्कुक्षौ नाभिबस्तौ च मध्ये च पञ्चमः स्मृतः॥२॥हृदयस्थो यकृन्नाम कुक्षौ साष्ठी- लकोच्यते॥मध्ये प्लीहा समाख्यातो बस्तौ चण्डविवृद्धकः॥३॥ नाभौ संलक्ष्यते ग्रन्थी नामान्येषां पृथक् पृथक् ॥ उदरमें फैले हुए गुल्म पांच प्रकारके हैं । हृदयमें एक, कुक्षिमें दूसरा, नाभिमें तीसरा, बस्ति- स्थानमें चौथा, मध्यभागमें पांचवाँ ऐसे गुल्म होते हैं ॥ २ ॥ हृदयमें उपजनेवाले गुल्मका यकृत् नाम है, कुक्षिमें होनेवाले गुल्मका अष्ठीला नाम है, मध्यभागमें प्लीहानामसे विख्यात है, बस्तिस्थानमें चण्डविवृद्धकनामवाला होता है ॥ ३ ॥ नाभिमें ग्रंथिनामसे लक्षित है । इनके नाम अलग अलग हैं ॥ अथ गुल्मके निदान । अतः प्रकोपं वक्ष्यामि येन कुर्वन्ति बाधकम् ॥४॥ स्वभावा- त्पित्तरक्तोत्थे सेविताम्लविदाहिनम् ॥ उष्णं च क्षारमद्यं वा चोष्णपानातिसेवनात् ॥५॥ तथा शोकः श्रमोऽध्वनां शोषो- त्संक्षोभनादपि ॥ उच्चभाषणगानेन धनुर्ज्याकरणेन च ॥ ६॥ पृष्ठे मुष्ट्यभिघातेन हृदयात्ताडनेन वा ॥भारणोद्धारणाद्वापि रक्तं शोषयते हृदि ॥ ७ ॥ तेन गुल्मेति नाम तु जायते रक्तपित्तकम्॥ कदाचित्त्रिषु दोषेषु सम्भवश्चास्य दृश्यते ॥८॥ वातेनोदीरितं चैव कफेन च घनीकृतम् ॥ पित्तेन पाकतां प्राप्तं त्रिदोषसंसृतं यकृत् ॥ ९ ॥ अब इनके प्रकोपको कहता हूं, जिसकरके पीड़ाको करते हैं ॥ ४ ॥ स्वभावसे रक्तपित्तके बिगड़ने पर अम्ल और विदाही पदार्थको सेवनेसे और गरम पदार्थ खार, मदिरा इनको सेवनेसे और गर्मपानके अतिसेवनेसे ॥ ५ ॥ शोक, श्रम, मार्गमें अत्यंत चलना, शोष, क्षोभ, ऊंचा बोलना, ऊंचे प्रकारसे गाना और धनुषकी टंकोरके करनेसे ॥ ६॥ पृष्ठभागमें मुक्केके लगनेसे और हृदयमें चोट आदिके लगनेसे, बोझके उठानेसे मनुष्यके हृदयमें रक्त सूख जाता है ॥ ७ ॥ इससे रक्तपित्त करके गुल्मरोग उपजता है और कभी तीनों दोषोंसे भी गुल्म उपजता है॥८॥ वातसे बढ़ा हुआ और कफसे कठिन हुआ और पित्तसे पाकभावको प्राप्त हुआ यकृत् त्रिदोषसे फैलता है ॥ ९ ॥