हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] भाषाटीकासमेता । (२३१) अथ यकृद्गुल्मका लक्षण । लक्षणं तस्य वक्ष्यामि येन तच्चापि लक्ष्यते॥ क्षीयते येन मनुजो मृत्युमाशु प्रपद्यते॥१०॥ वमिः क्लमस्तथोद्गारो हृल्लासः श्वसनं भ्रमः॥ दाहोऽरुचिस्तृषा मूर्च्छा कण्ठे दाहः शिरोव्यथा॥११॥ हृच्छूलं च प्रतिश्यायःष्ठीवनं कटुकैः सह ॥ सशल्यं हृदि शूलं च निद्रानाशः प्रलापतः ॥ १२ ॥ हृदये मन्यते दार्ढ्यमुदरं गर्जति भृशम्॥ एतैर्लिङ्गैर्विजानीयाद्यकृत्कोष्ठान्तवक्षसि ॥१३॥ उस गुल्मके लक्षणको कहूंगा, जिस करके वह भी लक्षित हो सकता है। इस रोगसे मनुष्य सूख जाता है और शीघ्र ही मृत्युको प्राप्त हो जाता है ॥ १० ॥ छर्दि आवे, ग्लानि उपजे, डकार आवे, थुकथुकी हो, श्वास और भ्रम उपजे और दाह, अरुचि, तृषा, मूर्च्छा, ये भी उपजें, कंठमें दाह हो और शिरमें पीड़ा हो ॥ ११ ॥ हृदयमें शूल हो, जुखाम कड़ुआईके साथ थूके, शल्यसहित शूल हृदयमें होवे नींदका नाश होवे, बकवाद करनेसे ॥ १२ ॥ और हृदयमें दृढ़ता माने और उदर अत्यंत गर्जे इन लक्षणोंसे कोष्ठके समीप छातीमें यकृत्संज्ञक गुल्म जानना ॥ १३ ॥ अथ शुण्ठ्यादि चूर्ण । शुण्ठ्यादिचूर्णं कटुकत्रयं च कुष्ठं तथा पञ्चमकं यवानीम्॥ षष्ठं च सिन्धूत्थविमिश्रितं च सूक्ष्मं च चूर्णं सह रामठेन॥ भक्षञ्च तस्योपरि तक्रपानं निष्क्वाथ्य तोयं च पिबेच्च वाम्लम्॥१४॥ सौवीरकं वा विनिहन्ति शीघ्रं यकृत्समानोदरशूलकासान् ॥ विसूचिकाजीर्णकफामयघ्नं पाण्डामयार्त्तिग्रहणीं सगुल्माम् ॥१५॥ शुण्ठ्यादिचूर्णं त्वरितं निहन्ति ॥ सोंठ, मिर्च, पीपल, कूठ, अजवायन, सेंधानमक, हींग, इनका महीन चूर्ण बना खावे ऊपर तक्र पीवे अथवा खट्टा जल क्वाथ बनाकर पीवे ॥ १४ ॥ अथवा कांजीका अनुपान करे। यह शुंठ्यादि चूर्ण यकृद्रोग, उदरशूल, खांसी, विसूचिका (हैजा) अजीर्ण, कफरोग, पांडु, संग्रहणी, गुल्मरोग इनकी शीघ्र नाशता है ॥ १५ ॥ अथ क्षारमृत । क्षारं मुष्कककिंशुकार्जुनधवापामार्गरम्भातिला जीवन्तीकन- काह्वयश्चरजनी कूष्माण्डवल्ली तथा ॥ वासासूरणमेव तीव्रदहने