भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 264

( २३२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- प्रज्वाल्य भस्मीकृतं तोयेन प्रतिसेव्य संभृतपयःपानं विधेयं यकृत् ॥ १६ ॥ शूलानाहविबन्धनांश्च कफजान्रोगाञ्जयेत् कामलां शूलं पाण्डुसुविप्रधींश्च ग्रहणीशोफार्शासां पीनसान् ॥ अग्नेर्मांद्यमजीर्णकृम्यलसता मोहो गुदभ्रंशता कासोद्गार- वमिक्षतोद्गतगदावृद्धिरस्तथा नश्यति ॥ १७ ॥ पूयाभः पतते श्लेष्मा पूतिगन्धोऽतिविस्रकः ॥ रक्ताभस्तत्र सङ्काशः ष्ठीवते स मुहुर्मुहुः ॥ तथातिसार्य्यते रक्तं श्रमः संक्षीयते वपुः ॥ १८॥ क्षतजाः संसृता गात्रे यकृद्वक्षसि संसृतः ॥ १९ ॥ “असाध्ययकृद्रोगलक्षणम्” श्वासस्तृषा वमिर्मोहः शोफः स्यात्करपादयोः॥रुचिबन्धोऽति- सारश्च यकृद्दूरं परित्यजेत् ॥ २० ॥ अतो वक्ष्यामि भेषज्यं येन संपद्यते सुखम् ॥ यकृद्रोगपर पाचन । तस्यादौ लङ्घनं चैकं पाचनं तदनन्तरम् ॥२१॥ शुण्ठ्योपकुल्या तिमिरं शठीनां यवानिकाभीरुहरीतकीनाम् ॥ क्वाथोथकल्क- पाचनके प्रशस्त आनाहगुल्मार्त्तिविषूचिकानाम् ॥ २२ ॥ भद्रोपकुल्याभयशृङ्गवेरं पथ्या त्रिभागा च कणाचतुर्था॥२३॥ मोक्षावृक्षं१, अण्डकोष या कठपाढारिबूंटी, टेसू, अर्जुनवृक्ष, धव, लटजीरा, केला, तिल, महुआ, धतूरा, हलदी, लालतुंबी, बांसा, जमीकंद, इनको तेजअग्निसे जला, भस्म बना, पानीमें मिला खार बनावे, इसको लेनेसे यकृतरोग ॥ १६ ॥ शूल, अफारा, बंधा, कफका रोग, कामला, विद्रधि, हृदयशूल, पांडु, संग्रहणी, शोजा, बवासीर, पीनस, मन्दाग्नि, अजीर्ण, कृमि, आलस्य, गुदभ्रंश, मोह, क्षतजरोग, वृद्धिरोग, दाह, शूल, खांसी, डकार, छर्दि इनका नाश होता है ॥ १७ ॥ राधके समान कफ पड़े दुर्गंधसे और कचे गन्धसे संयुक्त और रक्तके समान वारंवार थूके और रक्तका ही अतीसार जावे शरीरमें परिश्रम होवे शरीर सूखता जावे॥१८॥और क्षतसे उपजे रोग होवें ये लक्षण होवें तब छातीमें फैला हुआ यकृतरोग जानना ॥१९॥ श्वास, तृषा, छर्दि, मोह, ये उपजें हाथ और पैरोंमें शोजा होवे, रुचिबन्ध होवे और अतिसार होवें, १ मोक्षवृक्ष पर्वतोंमें पलाशके सदृश होता है। आ० श० ।