भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 265

अ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( २३३) ऐसे यकृतरोगको दूरसे त्यागे ॥ २० ॥ अब औषधको कहता हूँ-जिसकरके सुख- की प्राप्ति हो इस रोगकी आदिमें एक लंघन कर पीछे पाचन देना हित है ॥ २१ ॥ सोंठ, पीपल, लोहाका मैल, कचूर, अजवायन, शतावरी, हरडा इन्होंका क्वाथ अथवा कल्करूपी पाचन हित है। यह अफारा, गुल्म, विषूचिका (हैजा) इन्होंको नाशता है ॥ २२ ॥ नागरमोथा, पीपल, हरडै, अदरख ये ले परंतु इनमें तीन भाग हरड़ेके ले और पीपल इनका पाचनइस रोग- को नाशता है ॥ २३ ॥ अथ यकृद्गुल्मपथ्य । क्षतक्षये यकृत्पूर्वे तूपवासं च पाचनम् ॥ न देयं हिङ्गुसंयुक्तं चूर्णं नैव हितं यतः ॥ २४ ॥ क्षतक्षय रोगसे संयुक्त हुए यकृत् रोगमें लंघन और पाचन हित नहीं है और इस रोगवा- लेको हींगसे संयुक्त किया चूरन नहीं देना, क्योंकि वह हित नहीं है॥ २४ ॥ अथ निम्बादि क्वाथ । निम्बनीपधरवेतसं निशा काश्मरी च तुलसी च सिंहिका ॥ क्वाथ एष हृदयामयापहः शूलमाशु यकृतश्च नाशकृत्॥२५॥ नींबकी छाल, कदम्बकी छाल, बिनोलाकी गिरी, मन नामक वनकी ओषधि विशेष, हलदी, कंभारी, तुलसी, कटेहली इनका क्वाथ हृदयरोग, कफ, शूल, मुखका रोग और यकृत्- को नाशता है ॥ २५ ॥ अथ सौराष्ट्रिकादि क्वाथ । सौराष्ट्रिकासीसमहौषधानि दुरालभाजातिप्रवालकं च ॥ दार्बी यवानी ककुभं समङ्गा क्वाथः ससर्पिर्यकृदाशु हन्ति॥२६॥ फिटकरी, कसीस , सोंठ, जवासा, चमेलीकी कोंपल, दारुहलदी, अजवायन, अर्जुनवृक्षकी छाल, मंजीठ इनका क्वाथ घृत मिलाकर पीनेसे यकृतरोगका नाश होता है ॥ २६ ॥ अथ धवादि क्वाथ । धवार्जनकदम्बानां शिरीषबदरीषु च ॥ निष्क्वाथ्य पानमामघ्नं विषूच्या शूलवारणम् ॥ २७ ॥ धवके फूल, अर्जुन और कंदबवृक्षकी छाल, मौलशिरी और बेरकी छाल, इनका क्वाथ बना पीवे । यह आमदोष, विषूचिका (हैजा) शूल इनको दूर करता है ॥ २७ ॥ अथ कदलीजलपानक । कदलीक्षारमादाय शंखक्षारमथापि वा ॥ प्रस्त्राव्य जलपानं तु