हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- हिङ्गुसौवर्चलान्वितम् ॥ २८ ॥ आमं हरति विसृष्टं शूलं चाशु नियच्छति॥विषूचिकानां शमनमजीर्णं जरयत्यपि ॥ २९ ॥ केलाका खार, शखका खार, हींग, कालानमक इनको पानीमें मिलाकर पीवे ॥ २८ ॥ यह आमको हरता है और शूलको हरता है और विषूचिका (हैजा)को शांत करता है और अजीर्णको जराता है ॥ २९ ॥ अथ विजौरा आदिक पान । मातुलुङ्गरसं ग्राह्यं द्विगुणं तत्र काञ्जिकम् ॥ हिङ्गुसौवर्चलयुतं पानं हन्ति विषूचिकाम् ॥ ३० ॥ विजौराके रसमें दूनी कांजी मिलावे, हींग और कालानमकसे संयुक्त कर पीवे । यह विषूचि- काको हरता है ॥ ३० ॥ अथ खारका सेवन । क्षारं तोयं च पानाय दाहस्योपरि पाचयेत् ॥ शूलाध्मानं निहन्त्याशु कुरुते चाग्निदीपनम् ॥ ३१ ॥ खारके पानीको अग्निपै पकाके पीवे । यह शूल और अफाराको हरता है और अग्निको शीघ्र जगाता है ॥ ३१ ॥ अथ आमाजीर्णका उपाय । आमेषु वमनं कुर्य्याद्विपक्वे चैव लंघनम् ॥ विशिष्टस्वेदनं निद्रा रसशेषे विरेचनम् ॥ ३२ ॥ आमसंज्ञक अजीर्णमें वमन कराना और पके हुए अजीर्णमें लंघन, पसीना, नींद इनको सेवे । रस शेष अजीर्णमें विरेचन हित है ॥ ३२ ॥ अथ दिवास्वापविधान । उन्मत्ते चातिसारे च वमिक्रोधातुरेषु च ॥ अजीर्णे तु वि- षूच्यां च दिवास्वप्नं हितं भवेत् ॥ ३३ ॥ न हितं श्लेष्मणि चैव हृद्रोगे तु शिरोरुजि ॥ हृल्लासे च प्रतिश्याये दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ॥ ३४ ॥ उन्माद, अतीसार, छर्दि, क्रोध, अजीर्ण, विषूचिका ( हैजा ) इनमें दिनका सोना हित है ॥ ३३ ॥ कफरोग, हृद्रोग, शिरकी पीड़ा थुक्थुकी, जुखाम इन रोगोंमें दिनके शय- नको वर्जे ॥ ३४ ॥