हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 277, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ३५ ॥ गोधूमपोलिकाः श्रेष्ठा भृष्टाङ्गारैररोचके ॥ जाङ्ग्लानि च मांसानि भोजयेद्भिषगुत्तमः ॥३६॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे तृतीयस्थाने मन्दाग्निचिकित्सा नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ पंचकोल अर्थात् पीपली, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ इनकी यवागूको तथा कुलथी, अरहरकी दाल इनके यूषको भोजन करे, अथवा मूंगोंके यूषके संग चावलोंका भोजन करना हित है ॥ ३२ ॥ हींग, सोंठ, मिर्च, पीपल इनसे संयुक्त किया हुआ शाक भोजनकी अरु- चिमें अगतिसंज्ञक घृतकी तरह श्रेष्ठ कहा है ॥३३॥ करेला, परवल, प्याज, जमी- कंद, कचूर, इनका शाक श्रेष्ठ कहा है और नमक, धनियां, सोंठ, मिर्च, पीपल इनकी चटनी श्रेष्ठ है ॥ ३४ ॥ कचूर, सिरसम, बथुआ, सौंफ, मकोह, मीठीतोरी मूली, इनका शाक अरोचक रोगमें श्रेष्ठ कहा है ॥ ३५ ॥ अंगारोंपै सेकी हुई गेहूंकी रोटी जांगल- देशके जीवोंका मांस इनको वैद्यजन अरोचकरोगवालेको भोजन करवावे ॥ ३६ ॥ इति वेरीनिवासीसुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने मंदाग्निचिकित्सानाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः ७ अथ शूलनिदान । आत्रेय उवाच ॥ व्यायामपाननिशिजागरणव्यवायशोकातिभा- रगतिधावनकश्रमेण ॥ वैषम्यपानशयनेन च भोजनेन शीतेन वायुःकुपितः प्रकरोति शूलम् ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-कसरत, पान, रात्रिमें जागना, मैथुन, शोक, अतिबोझ, गमन, भागने और श्रमसे तथा विषम पान, विपरीत शयन, विपरीत भोजन और शीतल वस्तुके सेवनसे कुपित हुआ वायु शूलको करता है ॥ १ ॥ अथ वातशूलकी उत्पत्ति । विष्टम्भीरूक्षयवमाषकलायमुद्गनिष्पावकास्त्रिपुटकोद्रवको मसूरः गोधूमक्षुद्रकफलेक्षविभोजनेन चैतच्च पानमलरोधनमूत्ररोधैः ॥२॥ वायुस्त्वधोगतपथं प्रविरुह्य शूलं वातात्मको भवति चान्तरव-