भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

( २४६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

ह्निमांश्च ॥ तस्मादिति प्रबलताकुपितः प्रकोष्ठे शूलं करोति गुद- मार्गनिरोधितोऽपि ॥ ३ ॥ गात्रेऽपि तोदविरतिर्मलिनातिदीना वातार्तिपीडितनरस्य महामते स्यात् ॥ ४ ॥ विष्टंभी अर्थात् मलको बंद करनेवाला, सूखा भोजन, जव, उड़द, मोठ, मूंग, मटर, कोदूधान्य, चौला, मसूर, गेहूं, कफको पैदा करनेवाला और रूखा अन्नके भोजनोंसे और जलपान, मल, मूत्र, इनके रोकनेसे ॥ २ ॥ वायु अधोमार्गके मूलमार्गको रोक देता है । यह वातसे उत्पन्न हुआ शूल कहाता है और उदरके भीतर अग्नि दाह कर देता है । कोष्ठ- स्थानमें प्रबल होके कुपित हुआ शूलको उपजाता है और गुदाके मार्गको रोक देता है ॥ ३ ॥ शरीरमें भी पीड़ा, ग्लानि, मलीनता, दीनपना ये उपद्रव वातसे पीड़ित हुए मनुष्यके उत्पन्न होते हैं ॥ ४ ॥ अथ पित्तशूलनिदान । क्रोधातपादनलसेवनहेतुना च शोकाद्भयार्त्तिगतिधावनघर्मयो- गात्॥क्षाराम्लमद्यकटूकोष्णविदाहिरूक्षसौवीर¹शुष्कपललेख- नराजिकाभिः ॥ ५ ॥ वातः प्रकोपमयते किल तत्तु पित्तं शूलं करोति जठरेमनुजस्य तीव्रम्॥तेनाङ्गदाहारतिघर्मतृषार्त्ति- मूर्च्छा नाभ्यन्तरे दहति शोषणतास्य पैत्त्यम् ॥ ६ ॥ क्रोधसे, घाम और अग्निके सेवनसे, शोक, भय, पीड़ा, गमन करना, भागना और पसीना- के योगसे, खारा, खट्टा, मदिरा, चर्चरा, कुछ गरम, विदाही, रूक्ष पदार्थ, वेर, कांजी, सूखा पदार्थ, मांस, लेखन पदार्थ, राई ॥ ५ ॥ इनके खानेसे वायु कुपित होके पित्तको कुपित करता है, फिर वह पित्त मनुष्यके उदरमें दारुणशूल उत्पन्न करता है उससे अंगमें दाह, ग्लानि, पसीना, तृषा और मूर्च्छा ये उपद्रव होते हैं और नाभिके समीपमें दाह, शरीरमें शोष होता है और मुख पीला रहता है ॥ ६ ॥ अथ कफशूलकी उत्पत्ति । अव्यायामेऽस्निग्धसंसेवनेन लौल्याहारे चेक्षुतैलैः पयोभिः ॥ अल्पाहारे निद्रया सेवनैस्तु योगैरैतैः कुप्यते श्लेष्मकस्तु ॥७॥ माषातिशीतलपयोदधिभिः सुशीतैर्मत्स्यैस्त्वनूपपललैरतिसे- वितैस्तु॥श्लेष्मा भृशं शमयतेऽनलमाशु शूलं कोष्ठे करोति मनु-


१ 'सौवीरं वदरं घोटाप्यथ स्यात् स्वाडुकंटकः' इत्यमरः ।